Thursday, July 9, 2009

गे समाज के जय हो ..........


हमारे समाज में समलैंगिकता एक टैबू - एक वर्जना है। कोई भी व्यक्ति प्राय: खुलेआम इस बात को स्वीकार नहीं करेगा। इसकी एक वजह है भारतीय दंड संहिता की धारा 377 जिसके अंतर्गत समलैंगिक संबंध रखना जुर्म है। यह व्यवस्था अंग्रेजों की देन है जिन्होंने अपने यहां तो इससे कभी की मुक्ति पा ली है लेकिन हम इसे ढो रहे हैं। समलैंगिकता पर एक नजरिया धार्मिक है, जो ऐसे सभी अप्राकृतिक यौन संबंधों को पाप मानता है। दूसरा नजरिया वैज्ञानिक है। आज हमें मालूम है कि कुछ लोग जन्मजात समलैंगिक होते हैं या कहिए उनका विकास उस तरह हुआ होता है। हर सभ्यता में ऐसे लोग रहे हैं और अनेक जीव-जंतुओं में भी ऐसी प्रवृत्ति पाई जाती है। मसलन पेंग्विन। इसलिए दो वयस्क लोग अगर आपसी सहमति से साथ रहना या संबंध बनाना चाहते हैं तो समाज को क्यों आपत्ति होनी चाहिए? हां, इस बात की मुकम्मल व्यवस्था समाज और सरकार को करनी चाहिए

और स्टोरीज़ पढ़ने के लिए यहां क्लिक करेंकि किसी भी बच्चे का कोई शोषण न कर सके। धारा 377 से संबंधित दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला सिर्फ सहमति पर आधारित वयस्क संबंधों पर ही लागू होता है। यह फैसला एक तरह से हमारे वयस्क हो रहे लोकतंत्र की सभी नागरिकों को अपने में शामिल करने, उन्हें बराबरी का दर्जा देने और गरिमा के साथ जीने की दलील देता है और अब गेंद सरकार के पाले में है कि वह क्या करती है। कई देशों में गे लोग आपस में शादी कर सकते हैं और बच्चे गोद ले सकते हैं। इस फैसले से हमारे यहां भी वयस्क समलैंगिक सिर उठाकर जी सकेंगे। उनका नया नारा है : जय हो, गे हो। लेकिन सरकार के लिए इस फैसले से पैदा हुई स्थिति से निपटना आसान नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निर्देश पर गृह मंत्री पी. चिदम्बरम, कानून मंत्री वीरप्पा मोइली और स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने एक बैठक में इस प्रश्न पर विचार किया है लेकिन लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और कुछ अन्य नेताओं के तेवरों को देखते हुए लगता है कि सर्वानुमति बनाना मुश्किल साबित होगा। देश की अधिकांश जनता निरक्षर है (साक्षरता का अर्थ इतना है कि अनेक लोग अंगूठा लगाने की बजाय अब अपना नाम लिखना सीख गए हैं)। अमेरिका और यूरोप के देशों में लोग अपना सेक्सुअल रुझान बताने में नहीं झिझकते। मसलन मशहूर टेनिस खिलाड़ी मार्टिना नवरातिलोवा लेस्बियन रही हैं। अनेक राजनैतिक कार्यकर्ता और जन प्रतिनिधि भी इसी जमात से आते हैं। यही कारण है कि पश्चिम में एलजीबीटी (लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल और ट्रांसजेंडर) के अधिकारों के प्रति समाज में सहानुभूति है। अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने चुनाव अभियान के दौरान एलजीबीटी के नाम एक खुला पत्र लिखकर वादा किया था कि अगर वे जीते तो समलैंगिक शादियों को मान्यता दिलाने के लिए अपने प्रभाव का इस्तेमाल करेंगे। उन्हें इस जमात का समर्थन भी मिला। भारत में अगर मान लीजिए पांच-सात करोड़ लोग भी इस वर्ग के हों, तो आगे चलकर वे एक वोट बैंक में तब्दील हो सकते हैं। लेकिन भारत में गुजरात की एक पूर्व रियासत के युवराज को छोड़कर (मानवेंद्र सिंह गोहिल) कोई भी बड़ी पब्लिक फिगर अपने सेक्स रुझानों के बारे में बताने के लिए आगे नहीं आई। हमारे यहां अभी सिर्फ सिविल सोसायटी में ही इस वर्ग के प्रति थोड़ी-बहुत सहानुभूति बनी है। ज्यादातर लोग इस प्रश्न पर बात भी नहीं करना चाहते। पता नहीं यह सृष्टि ईश्वर ने बनाई है या कि डार्विन के अनुसार इवोल्यूशन के सिद्धांत पर अस्तित्व में आई है, मगर कहीं न कहीं है कुछ विचित्र गड़बड़झाला। अधिसंख्य प्राणियों में काम और सन्तानोत्पत्ति की एक-सी प्रक्रिया है। फिर एक बहुत ही छोटे से वर्ग में कोई स्त्री दूसरी स्त्री के प्रति या कोई पुरुष दूसरे पुरुष के प्रति ही आकर्षित क्यों होता है। कहते हैं, सुकरात जैसा महान दार्शनिक भी समलैंगिक था जबकि बाबर ने अपने प्रसिद्ध 'बाबरनामा' में ऐसे बड़े लोगों का उल्लेख किया है जो अपने घरों में बीसियों लौंडे रखते थे। बाबर ने उन्हें फटकारा है। इसलिए कि यह अप्राकृतिक माना जाता था। आज भी माना तो इसे अपवाद ही जाएगा लेकिन अगर दो लोग आपस में खुश हैं तो समाज को कोई हक भी नहीं कि वह उनके साथ भेदभाव करे। वे अगर ऐसे हैं तो इसमें उनका कोई दोष भी तो नहीं। वे अपने हॉर्मोन के कारण, जेनेटिक कारण और माहौल के कारण ऐसे हैं और ऐसे ही रहेंगे। उनका कोई इलाज नहीं हो सकता, जैसा कि स्वामी रामदेव दावा कर रहे हैं। उन्हें ऐसे ही स्वीकार करना होगा। जहां तक प्रतिभा की बात है, वे किसी से कम नहीं होते। जैसे कि खब्बू लोग। जिस तरह समलैंगिकों का एक वर्ग है, उसी तरह पैदल चलनेवालों का भी एक वर्ग है। बहुत बड़ा वर्ग। लेकिन उसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। उनके अधिकारों की कोई बात नहीं करता। क्योंकि एक तो वे गरीब हैं और दूसरे असंगठित। महानगरों की फुटपाथों पर, सड़क पार करते हुए या साइकल चलाते हुए इस वर्ग के सैकड़ों लोग हर साल मारे जाते हैं लेकिन आप विडंबना देखिए कि सिविल सोसायटी उनके बारे में कतई नहीं सोचती। पिछले दिनों दिल्ली के मयूर विहार के निकट एक स्त्री को किसी वाहन ने कुचल डाला। पुलिस जब तक आई महिला का शव पहचाने जाने की स्थिति में नहीं था। क्षत-विक्षत। पुलिस का कहना है कि टक्कर लगने के बाद जब महिला सड़क पर गिरी तो उसे किसी ने नहीं उठाया और अनेक गाडि़यां उसे कुचलते हुए गुजरती रहीं। राजमार्गों पर प्राय: आपने कुत्तों की लाश के ऐसे चिथड़े उड़ते हुए देखे होंगे। तो क्या दिल्ली में एक गरीब महिला कुत्ते से भी कमतर हो गई? दिखावा करने और भागमभाग में रहनेवाले इस शहर में अगर कोई आदमी सड़क पर टक्कर खाकर गिर जाए और आप अपना स्कूटर या गाड़ी रोककर उसे उठाना चाहें तो पीछे से आ रही कारें हॉर्न बजा-बजाकर कहेंगी कि हटो बीच से। दया करनी है तो सड़क के एक किनारे होकर करो। हमें क्यों लेट कर रहे हो। वे गालियां तक दे देते हैं। ज्यादातर गरीब और निम्न मध्यवर्गीय लोग ही मदद को आगे आते हैं जैसे राजमार्ग पर कोई दुर्घटना हो या रेल दुर्घटना हो तो गांव वाले आगे आते हैं। दिल्ली के ज्यादातर लोग हृदयहीन होते जा रहे हैं। गरीबों के प्रति तिरस्कार का भाव। मानो गरीब होना कोई जुर्म हो। इसलिए उनके कुचलकर मरने की खबर भी कोई बड़ी खबर नहीं बनती। और गरीबी इतनी अधिक और इतनी तरह की है कि गरीब लोगों का कोई संगठन नहीं है। उनकी आवाज कौन उठाएगा?

लालगढ़ में लाल लड़ाई


लालगढ़ कांड
की प्रस्तावना का पहला शब्द नंदीग्राम है। 24 परगना के इसी जिले में भूमि अधिग्रहण के नाम पर किसानों के बीच सबसे पहले रोष फैला था। माओवादियों ने राजनैतिक कार्यकर्ताओं की आड़ में प्रतिरोध का नया व्याकरण रचा और नतीजा सबके सामने है। मगर लालगढ़ तक आते - आते माओवादी नेपथ्य से निकलकर मंच पर आ चुके थे। इसकी वजह कई गिनाई जा सकती हैं। उड़ीसा और झारखंड की नक्सल बेल्ट से यह इलाका बेहतर तरीके से कनेक्टेड है , इसलिए कैडर मूवमंट में आसानी थी। घोर गरीबी और सीपीएम की गुंडागर्दी के कारण आदिवासियों में असंतोष था। 2007 के बाद माओवादियों ने दूसरी तथाकथित फासिस्ट पार्टियों के बजाय सीपीएम के ऊपर अपनी रणनीति केंद्रित कर दी थी। मगर इन तमाम वजहों के बीच सबसे बड़ा सच यही है कि वेस्ट बंगाल सरकार अपनी राजनैतिक सुविधा के नाम पर माओवादियों की तरफ ध्यान देकर भी चुप रही। हथियारों की भाषा बोलने वालों ने खुले आम इंडियन स्टेट को चैलिंज किया और इस सबमें गरीब आदिवासी ढाल की तरह इस्तेमाल हुए। लेफ्ट ने इस बीच कभी टीएमसी पर निशाना साधा तो कभी केंद्र के पाले में गेंद उछाली। मगर उन मूलभूत सवालों के जवाब खोजने की कोशिश नहीं की , जिनकी वजह से इसके गढ़ हाथ से निकलते जा रहे हैं। कार्रवाई में देरी का सबब ऐसा कम ही होता है कि किसी इलाके में तैनात पुलिस अफसर के मातहत काम करने वाले जवान कैंप छोड़कर चले जाएं और अफसर को एक घंटे बाद मीडिया के जरिए इसकी खबर पहुंचे। मगर लालगढ़ में डिप्टी एसपी ऑपरेशंस अरनब घोष के साथ ऐसा ही हुआ। घोष एक प्रतीक भर हैं। माओवादियों से निपटने में राजनैतिक इच्छाशक्ति की इतनी कमी रही कि तमाम अफसरों से इस बारे में पूछने पर एक ही जवाब मिलता है , हम कुछ नहीं जानते , राइटर्स बिल्डिंग के पास ही सारे सवालों के जवाब हैं। छह दिनों तक राज्य के चीफ सेक्रटरी अशोक मोहन चक्रवर्ती यही कहते रहे कि हर मुमकिन प्रयास किए जा रहे हैं। तो क्या ये मान लिया जाए कि वेस्ट बंगाल में प्रशासन नाम की कोई चीज ही नहीं है और सीपीएम कैडरों की सत्ता खत्म होते ही राज्य में कानून ? का राज नहीं रह जाता। दरअसल नंदीग्राम की वजह से सीपीएम को इतना राजनैतिक नुकसान उठाना पड़ा कि वह प्रतिरोध शब्द सुनते ही चौकन्नी हो उठी। माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर जब आदिवासियों का उत्पीड़न हुआ , तो उन्होंने पुलिस प्रतिरोध समिति बना ली। लेफ्ट को लगा कि मिदनापुर में एक और नंदीग्राम बनाने की तैयारी हो रही है। साथ ही लेफ्ट को भरोसा रहा कि इस स्ट्रॉन्गहोल्ड में उनके अपने कैडर ही हालात से निपट लेंगे। मगर माओवादी लगातार अपनी स्थिति मजबूत करते रहे और लेफ्ट कैडरों के आक्रामक होने से पहले ही उन्होंने धरमपुर और दूसरे इलाकों में धावा बोल दिया। स्थिति हाथ से जाने के बाद राज्य सरकार केंद्र के पाले में गेंद फेंकने में जुट गई। जब केंद्र सरकार ने अपना रवैया साफ कर दिया और कहा कि कार्रवाई राज्य सरकार को ही करनी होगी , तब ऑपरेशन लालगढ़ की तैयारियां शुरू हुईं। सालबोनी में लैंड माइन अटैक के बाद भी वेस्ट बंगाल प्रशासन के कान नहीं चेते। उस घटना के वक्त डीजीपी रहे ए . बी . वोहरा ने पार्टी लाइन पर चलकर अपने कार्यकाल को निपटाया। उस वक्त वेस्ट मिदनापुर के एसपी अजय नंद थे , जिन्होंने माओवादियों से निपटने के लिए स्थानीय मुखबिरों की मदद से एक ब्लूप्रिंट तैयार किया था। नंद को कहा गया कि स्थानीय सीपीएम दफ्तर में आएं और पार्टी के पदाधिकारियों के साथ वह ब्लूप्रिंट डिस्कस करें। नंद ने इनकार कर दिया और उनका ट्रांसफर नांदिया कर दिया और फिलहाल वह प्रतिनियुक्ति पर हैदराबाद में हैं। ठीक इसी तरह से वेस्ट मिदनापुर के मौजूदा एसपी मनोज वर्मा भी फंसे हुए हैं। उनको काबिल आईपीएस अफसर माना जाता है , लेकिन उनके सुझावों पर कान देने के लिए राइटर्स बिल्डिंग में कोई तैयार ही नहीं है। प्रशासन बना सेकंडरी लाइन वेस्ट बंगाल के शहरी इलाकों को अगर छोड़ दिया जाए , तो ग्रामीण इलाकों में सीपीएम कैडर का फरमान ही प्रशासन का फरमान होता है। राशन कार्ड हों या कोई दूसरी जरूरत प्रशासन सीपीएम यूनिट के निर्देश पर ही काम करता था। राजनैतिक टिप्णीकारों के मुताबिक पार्टी के दिवंगत राज्य सचिव अनिल बसु का मानना था कि प्रशासन में आने की पहली योग्यता राज्य सरकार के राजनैतिक लक्ष्यों के प्रति समर्पण होना चाहिए। इसी वजह से लालगढ़ और दूसरे इलाकों में सीपीएम कैडर के ढेर होते ही अराजकता की स्थिति मच गई। 70 के दशक में सत्ता में आने के बाद से सीपीएम ने अपना विस्तार इतना आक्रामक होकर किया कि इसकी सहयोगी पार्टियों मसलन फॉरवर्ड ब्लॉक और सीपीआई को भी नए इलाकों में नहीं पनपने दिया गया। इसी एकाधिकार के कारण अब आदिवासी हों या सामान्य किसान सभी के गुस्से का शिकार सीपीएम हो रही है। माओवादियों की कार्रवाई को देखने से यह साफ होता है कि इन आदिवासी इलाकों में रहने वाले सीपीएम कैडर हथियारों से लैस थे। परोक्ष सत्ता स्थापित करने में यह तथ्य मददगार साबित होता था। इसीलिए माओवादियों ने इन कैडरों को साफ कर दिया कि अगर अपने घर और जमीन पर वापस लौटना है , तो न सिर्फ पुलिस प्रतिरोध समिति के साथ अपनी संबद्धता स्थापित करनी होगी , बल्कि अपने हथियार भी सरेंडर करने होंगे। धरमपुर में तकरीबन 4 हजार लोग वापस आ गए। उनका कहना है कि हमारी सीपीएम से जुड़े नेता या तो मारे गए या भाग गए , ऐसे में हम कहां जाएं। कई सीपीएम कैडरों ने अपने हथियार भी इस कमिटी के सामने सरेंडर कर दिए। माओवादी आक्रोश की यह भाषा बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। सीपीएम दफ्तरों को ढोल और क्रांति के नारों के शोर के बीच आग के हवाले करते आदिवासी दशकों की उपेक्षा का बदला ले रहे हैं। ये सब काम जिस माओवादी दस्ते के अधीन हुआ , उसके नायक हैं कंधे पर ए . के . 47 टांगे बगावत का ऐलान करते बिकास। बिकास माओवादी जनवादी लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के सदस्य हैं। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने गर्वपूर्वक कहा कि यहां जमीन तैयार हो चुकी है और हमारा इंतजार कर रही है। मुहावरेदार भाषा का इस्तेमाल करते हुए बिकास कहते हैं कि बच्चा पैदा हो चुका है और हम इस काम में सिर्फ नर्स की भूमिका अदा कर रहे हैं। माना जा रहा है कि बिकास उन 400 गुरिल्ला लड़ाकों में से एक हैं , जिन्होंने लालगढ़ ऑपरेशन को अंजाम दिया। पुलिस सूत्रों के मुताबिक इन लड़ाकों की फौज 6 जून को लालगढ़ में इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए घुसी। इनमें से 100 लड़ाकों के पास अत्याधुनिक स्वचालित हथियार हैं। राजनीति के रंग वेस्ट बंगाल में सभी राजनैतिक दल अगले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर कदम उठा रहे हैं। कांग्रेस ने जब राज्य सरकार की अक्षमता पर सवाल उठाते हुए सत्ता छोड़ने की सलाह दी , तो लेफ्ट ने नरमी से प्रतिक्रिया दी। लेफ्ट की पूरी कोशिश रही कि मामला इतना लंबा खिंचे कि माओवादी खुद ही टीएमसी को उघाड़ने लगें और ऐसा ही हुआ भी। यहीं सीपीएम की इंतजार करो की रणनीति कुछ सफल होती दिखी जब माओवादी नेताओं बिकास और किशनजी ने कहा कि नंदीग्राम में हम टीएमसी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर लड़े। जाहिर है कि शहरी वर्ग के बीच खुद को विक्टिम बताकर सीपीएम को फिर से पनपने का मौका मिल सकता है। उधर नैतिकता की नाव पर सवाल ममता फिलहाल चुप्पी साधे हैं। दरियाफ्त करने पर उनके दफ्तर से जवाब मिलता है कि मैडम रेल बजट में बिजी हैं। सीपीएम ने गरीबों की बात करके राजनीति शुरू की , लेकिन बुद्धदेव के आने के बाद से पार्टी नई पीढ़ी का हवाला देकर औद्योगिकीकरण की नीति अपना रही है। इस वजह से न सिर्फ आदिवासी और सीमान्त इलाकों में बसे लोग , बल्कि पार्टी को सपोर्ट देते रहे बुद्धिजीवी भी लेफ्ट फ्रंट से बिदकने लगे। खुद सीपीएम के कैडर भी मानते हैं कि नरेगा से लेकर तमाम मुद्दों पर सरकार की तरफ से गलतियां हुई हैं। सच्चर कमिटी की रिपोर्ट बताती है कि राज्य में मुस्लिमों की दशा सबसे ज्यादा खराब है। फिलहाल राज्य के 17 जिले ऐसे हैं , जहां खेती ही जीविका का मूल आधार है। इन जिलों के 60 फीसदी घरों में बीपीएल कार्ड है और 99 फीसदी परिवारों के घर राशन का ही चावल - गेंहू आता है। जाहिर है कि जब अन्न का स्त्रोत सीपीएम के प्रति वफादारी हो , तो खुलकर बगावत कौन करे। इसी असंतोष को माओवादियों ने कैश कराया। टीएमसी उग्र वाम के बूते सत्ता समीकरण साधती रही , लेकिन अब उन्हें भी शहरी जनता को जवाब देना होगा कि आखिर माओवादियों के साथ उनके किस तरह के संबंध हैं। वैचारिक आधार पर ममता की अपनी कोई खास पहचान नहीं। वह सिर्फ लेफ्ट फ्रंट के प्रतिपक्ष का चेहरा हैं। उनकी भाषा वाम राजनीति के कोष से ही आती है। ऐसे में माओवादियों का असर बढ़ने पर ममता सिर्फ प्यादे की भूमिका में रह जाएं , तो कोई बड़ी बात नहीं होगी। राजनैतिक नियंत्रण की लड़ाई में ममता उसी दिन से पिछड़ने लगीं , जब माओवादी नेताओं ने खुले आम मीडिया में बयान देने शुरू कर दिए। माओवादी नेता कोटेश्वर राव ने साफ कर दिया कि लालगढ़ के मसले पर ममता अपना रुख साफ करें , वर्ना जनता उन्हें भी सबक सिखाने को तैयार है। ममता अब तक नंदीग्राम और तमाम दूसरी जगहों पर होने वाले आंदोलन को जनप्रतिरोध कहती रही हैं। लेकिन अब उन इंटेलिजंस रिपोर्टों को भी जमीन मिल गई है , जो आंदोलनकारियों के बीच माओवादी तत्वों की उपस्थिति का संकेत देती रही हैं। उधर कांग्रेस सेफ गेम खेल रही है। राज्य के नेता लेफ्ट को घेरे में ले रहे हैं , तो केंद्र सरकार यह सुनिश्चित करना चाह रही है कि माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई राज्य सरकार करे और अपने रिस्क पर करें क्योंकि हालात बिगड़ने के लिए भी वही जिम्मेदार है। गृह मंत्री पी . चिदंबरम ने साफ कहा कि वेस्ट बंगाल के पास उचित संख्या में पुलिस बल हैं और उन्हें अभियान की अगुवाई करनी चाहिए , जैसा कि वे कर भी रहे हैं। चिदंबरम ने हालांकि , इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि राज्य सरकार माओवादियों पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगा रही है जैसा कि कई अन्य राज्य सरकारों ने किया है। मगर इस सारी राजनैतिक कसरत के बीच किसी कैडर का शव आठ दिनों से सड़ रहा है , तो कोई गरीब आदिवासी औरत अपने ही राज्य की पुलिस के खिलाफ निहत्थी लड़ रही है। राजनैतिक पार्टियां नहीं बतातीं कि राज्य की बदहाली दूर करने के लिए उनके पास क्या राजनैतिक कार्यक्रम हैं।

Tuesday, April 28, 2009

मुद्दा : विकास की राह से दूर ग्रामीण महिलाएं..........


देश की करीब 70 फीसद आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। उसमें से अधिकतर लोग कृषि कार्यों पर निर्भर रहकर जीवन-यापन करते हैं। इनमें से आधी आबादी यानी महिलाएं घर गृहस्थी संभालने के साथ-साथ कृषि कार्यों में हाथ बटांती हंै। उनकी इस महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। घर से खेती तक तथा खेत-खलिहानों से गोदामों तक सभी कार्यों में उनकी बराबरी की हिस्सेदारी है। यह अलग बात है कि इतना होने पर भी उनकी कोई खास पहचान नहीं है क्योंकि अर्थव्यवस्था की चाबी प्राय: पुरूषों के हाथों में है। अत: वे तरक्की की राह पर नहीं बढ़ पातीं। उनकी राह में अशिक्षा, अनभिज्ञता, उदासीनता, अंधविश्वास आदि रोड़े का काम करते हैं। ऐसी स्थिति में राष्ट्र विकास में अपनी छिपी भूमिका रखने वाली इन महिलाओं के सशक्तीकरण पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। इसके लिए उनकी शिक्षा का समुचित प्रबंध करना आज की जरूरत है।असल में शहरी क्षेत्रों में तो महिलाओं के लिए अनेक अवसर उपलब्ध होते हैं। वे अपने लिए नए रास्ते आगे बढ़ सकती हैं परन्तु ग्रामीण क्षेत्रों में न तो ऐसी परिस्थितियां मौजूद हैं और न ही उन्हें इतना अधिकार है कि वे स्वतंत्र माहौल में रहकर शिक्षा ग्रहण करें या करियर के बारे में सोचें। जरूरी है कि उन्हें जागरूक बनाकर उनके रास्ते की बाधाओं के बारे में जानकारी उपलब्ध कराई जाए। कृषि कार्यों के दौरान भी उनकी शिक्षा का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए ताकि उनमें अधिक जागरूकता बढ़े तथा वे और अधिक सृजनात्मक तरीके से कार्य कर सकें। उनके लिए समय व श्रम बचाने वाली तकनीकी जानकारी सरल भाषा में रोचक ढंग से उन तक पहुंचने का प्रबंध होना चाहिए।देश में कुल महिला श्रमबल का प्रतिशत 23 है जबकि कृषि कार्यों में लगभग 55-60 फीसद है। पहाड़ी क्षेत्रों में तो लगभग 75 फीसदी कृषि कार्य महिलाएं ही करती हंै। हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, प.बंगाल, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आदि पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतर महिलाएं ही खेतीबाड़ी संभालती हंै। अन्य जगहों पर भी महिलाएं खेती संबंधित कार्यो में हाथ बटांती हैं। ऐसे में सरकार को भी इनके लिए आवश्यक सुविधाओं का प्रबंध करना चाहिए ताकि इनमें और अधिक विश्वास और कार्यक्षमता का विस्तार हो सके। वैसे सरकार की तरफ से रेडियो व टेलीविजन के माध्यम से इनके लिए लगातार जागरूकता कार्यक्रम प्रस्तुत होते रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप कृषि से संबंधित जानकारी का फायदा इन तक पहुंचाया जा रहा है। कुछ क्षेत्रों में तो इनके सकारात्मक परिणाम दिखने भी लगे हंै पर इतना काफी नहीं है। दूर-दराज के इलाकों में ज्यादा ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है ताकि अंधेरे में आशा की रोशनी जलाई जा सके।सर्वविदित है कि हमारी जनसंख्या में आधा हिस्सा महिलाओं का है और वे देश के विकास में पुरूषों के बराबर ही महत्व रखती हंै। स्वतंत्रता के पूर्व ग्रामीण महिलाओं की स्थिति शोचनीय थी। महिलाओं के प्रति रूढ़िवादी एवं परंपरागत सोच ने उन्हें चारदीवारी तक सीमित रखा परन्तु अब उन्होंने दायरे को तोड़कर बाहर निकलने की कोशिश की है। कृषि कार्यों के साथ-साथ महिलाओं ने बड़ी तादाद में घरेलू दायित्वों के अतिरिक्त कारखानों, बागानों, खदानों, डेरी, पशुपालन, पोल्ट्री-फार्म, चाय बागान, रेशम कीट-पालन तथा कृषि से संबंधित लघु उघोगों मे भी योगदान कर रही हैं। कृषि कार्यों में प्रत्यक्ष योगदान के बावजूद भी उन्हें कृषक श्रेणी में नहीं रखा गया है जबकि वे कृषि में सभी प्रकार के कार्य करती हैं। महिलाओं के प्रत्यक्ष योगदान एवं सक्रिय भागीदारी से अनेक क्षेत्रों में पैदावार बढ़ाने में भी मदद मिली है।कृषि मंत्रालय ने इनके विकास के लिए अनेक योजनाओं के माध्यम से सशक्तीकरण कार्यक्रम चला रखे हैं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति में सुधार आ रहा है। देश में लगभग 500 से ज्यादा कृषि विज्ञान केन्द्र कार्य कर रहे हैं। इनके द्वारा ग्रामीण विकास हेतु कृषि कार्यों में संलग्न महिलाओं के लिए विशेष कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। आवश्यकता है ग्रामीण महिलाओं को आगे बढ़कर पहल करने तथा रूचि लेकर लाभ उठाने की। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य यह होना चाहिए कि किसान परिवार की आम महिलाएं यह जान सकें कि स्वच्छता, समुचित शिक्षा, पोषण, वैज्ञानिक द्वष्टिकोण आदि से जागरूकता बढ़ती है और विकास कार्य के लक्ष्य की प्राप्ति बिना महिलाओं की भागीदारी के अधूरी है।वैश्वीकरण के इस दौर में महिलाए कृषि कार्यों में रीढ़ का काम करती हैं। जितनी तेजी से महिलाओं का विकास होगा उतनी ही तेजी से सामाजिक विकास होगा तथा एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण होगा। अत: महिलाओं के विकास को बढ़ावा देने की आवश्यकता है ताकि कृषि कार्यों के साथ-साथ वे अन्य क्षेत्रों में भी उतनी ही भागीदारी निभा सकें।

राजनीतिक कलाबाजी..................

चुनाव समाप्त होने के पूर्व ही राजनीतिक दलों द्वारा अगली सरकार को लेकर की जा रही बयानबाजी वास्तव में ऐसी अशोभनीय राजनीतिक कलाबाजी है जिसकी आलोचना किए जाने की आवश्यकता है। यह कलाबाजी ज्यादातर संप्रग के पूर्व घटकों, कांग्रेस एवं वामपंथी दलों की ओर से ही प्रदर्शित की जा रही है। कांग्रेस ने पहले राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव पर टिप्पणी की तो लालू ने उसका जवाब यह कहकर दिया कि उनका तो वामपंथियों से पुराना रिश्ता रहा और उनके लिए हमेशा दरवाजा खुला है। उनके नए-नए मित्र बने रामविलास पासवान ने भी उनकी हां में हां मिला दी। माकपा तो लगातार यही साबित करने की कोशिश कर रही है कि चुनाव के बाद कांग्रेस या भाजपा के नेतृत्व में सरकार गठित होने की कोई संभावना नहीं है और जो दल उनके साथ हैं वे भी हालात देखकर तीसरे मोर्चे के साथ आ जाएंगे। इसके विपरीत जो भी बातें सामने आतीं हैं माकपा तुरत उसका खंडन कर अपनी इस स्थापना को दुहराती है। इन कलाबाजियों में अगले प्रधानमंत्री पर भी चर्चा शामिल है। ऐसी चर्चा जब आप करेंगे तो प्रधानमंत्री पद का प्रश्न उठेगा ही और इसी प्रक्रिया में माकपा महासचिव प्रकाश करात का नाम बतौर प्रधानमंत्री उछल गया। हालांकि उन्होंने अगले दिन इसका खंडन कर दिया। किंतु इससे आम मतदाता के मन में कई प्रकार के संशय उभरने लगे हैं। इसमें सबसे बड़ा प्रश्न राजनीतिक नैतिकता का है। इनकी कलाबाजी से संदेश यह निकल रहा है कि इस समय चाहे कोई दल किसी के साथ गठजोड़ करके चुनाव लड़ रहा हो सरकार बनाने में उनका साथ रहना आवश्यक नहीं है। वे राजनीतिक परिस्थितियां बदलते ही अपनी निष्ठा बदलकर जिधर ज्यादा संख्याबल होगा, उधर मुड़ जाएंगे। ऐसे में मतदाता के सामने बार-बार यह प्रश्न कौंधता है कि तो फिर मत किसे दिया जाए? जो आज साथ है उसके आगे रहने की गारंटी ही नहीं है और विजय का लाभ उठाकर वह अपना पाला बदल देगा तो फिर उसे मत दिया क्यों जाए? मतदाता यदि गठजोड़ या चुनावी तालमेल के साथी के तौर पर किसी दल या उम्मीदवार को मत देता है तो उसकी अपेक्षा यही है कि वह उसका सम्मान करे। यानी पाला न बदले। किंतु वामदलों और संप्रग के पूर्व एवं वर्तमान साथी दलों के रवैये से मतदाता की इस स्वाभाविक अपेक्षा की खिल्ली उड़ रही है। इससे बड़ी राजनीतिक अनैतिकता और क्या हो सकती है कि जिस दल या गठजोड़ के खिलाफ आप आग उगल रहे हैं, कल उनसे ही यह उम्मीद करते हैं कि वह अपनी धारा बदलकर आपके साथ आ जाए! वामदलों का रवैया उन दलों को एक प्रकार से अपने साथ आने का निमंत्रण देने वाला है। अगर ये राजनीति की बची-खुची प्रतिष्ठा की रक्षा करना चाहते हैं तो अपना रवैया बदलें एवं मतदाताओं की भावनाओं का सम्मान करें।

Monday, April 6, 2009

लोकतांत्रिक ताकतों को मिले मजबूती

लाहौर के पुलिस प्रशिक्षण केंद्र पर हमले से एक बार फिर साफ हो गया है कि पाकिस्तान पर आतंकवादियों की पकड़ मजबूत हो गई है। अब तक पाकिस्तान के पश्चिमी प्रांत और कराची जैसे शहरों में ही आतंकवादियों का रूतबा था लेकिन लाहौर पर लगातार हो रहे हमलों से पता चलता है कि पूर्वी प्रांत पर भी उनकी मजबूत पकड़ बन गई है। पाकिस्तान में जहां भी आतंकी हमले हो रहे हैं, उसके लिए वहां की राजनीति और सत्ता पर मौजूद लोगों की नीतियां ही जिम्मेदार हैं। आज भी वहां शीर्ष स्तर पर आतंकवाद को जांचने या उस पर अंकुश लगाने की ठीक से कोशिश नहीं की जा रही है। मुंबई हमलों के दोषियों के संबंध में पाकिस्तान ने जो कुछ भी कहा, वह सारे विश्व के सामने है। खुद अपने यहां हो रहे आतंकी हमलों को लेकर भी उसकी जांच प्रक्रिया में ढिलाई बरती जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो श्रीलंकाई खिलाड़ियों पर हुए हमले के दोषी अब तक जरूर पकड़े गए होते। दरअसल पाकिस्तान में आतंकवादी समूहों को फलने-फूलने का पूरा मौका दिया गया। यहां तक कि सीमा पर जाकर अफगानिस्तान जैसे देशों में भी आतंकवादियों को उसने मदद पहुंचाई। अब यही आतंकी समूह इतने मजबूत हो गए हैं कि सरकार को खुली चुनौती देने लगे हैं और सरकार भौंचक मुद्रा में है। यहां यह बात भी गौर करने लायक है कि वहां की सरकार अब भी आतंक मिटाने को लेकर प्रतिबद्धता नहीं दिखा रही। सेना, नौकरशाह और सरकार में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिनकी सहानुभूति लश्करे तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद और तालिबान जैसे संगठनों से है।सवाल यह है कि किया क्या जाए? जिस विष बेल को उसने खुद रोपा था, उसके समूल नाश के लिए भी उसे ही आगे बढ़ना होगा। अमेरिका जैसा देश कुछ नहीं कर सकता। वह तो बस अपनी रोटी ही सेंक सकता है। फिर आतंकवाद के खिलाफ वह पाकिस्तान की नहीं, अपनी लड़ाई लड़ रहा है। पाकिस्तान में सबसे जरूरी है कि लोकतांत्रिक शासन को अहमियत दी जाए। जिस तरह का लोकतंत्र अभी वहां है, वह उसकी जरूरत नहीं है। वहां की जरूरत शासन में स्थिरता की है। शासन में सेना-आईएसआई का प्रभाव कम से कम होना चाहिए। अभी जो स्थिति है उसमें गिलानी, शरीफ और जरदारी जैसे लोग जिस तरह की उदार लोकतांत्रिक शक्ति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वह दिन ब दिन हाशिये की आ॓र बढ़ रही है। कुछ दिनों पहले चले नवाज शरीफ के अभियान के समय तो ऐसा लग रहा था कि शासन की बागडोर फिर सेना के हाथ में जा सकती है। वह तो सेना ही ऐसा नहीं चाह रही थी अन्यथा आज कयानी वहां की सत्ता पर काबिज होते। पीछे झांक कर देखा जा सकता है कि जब-जब वहां लोकतांत्रिक ताकतें विफल हुई हैं, सेना ने सत्ता हथियाई और उसके बाद वहां के हालात और बिगड़े। दरअसल वहां मजबूत लोकतंत्र चाहिए जिसमें विपक्ष का भी रोल ऐसा नहीं हो जिससे सेना या आईएसआई को अपने पैर पसारने में मदद मिले।जैसे-जैसे समय बीत रहा है पाकिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाना और मुश्किल होता जा रहा है। आम लोगों के बीच आतंकी और उग्रवादी इस तरह घुलते-मिलते जा रहे हैं कि आतंकवाद के खिलाफ अभियान से आम लोगों के भी प्रभावित होने का खतरा है। अभी अमेरिका जिस तरह से तालिबान के उदार तबके के साथ उदारतापूर्ण रवैया अपनाने का संकेत कर रहा है, वह किसी के हित में नहीं है। कोशिश यह होनी चाहिए कि आतंकवाद के खिलाफ पाकिस्तान को प्रभावी कदम उठाने को मजबूर किया जाए और उदारवादी तबकों को मजबूत करने की दिशा में बढ़ा जाए। वहां लोकतंत्र की कागजी मजबूती नहीं बल्कि वास्तविक मजबूती चाहिए। उसे आतंकवाद मिटाने के लिए जो मदद जा रही है उसकी पाई-पाई का हिसाब लिया जाए और इसकी निगरानी सख्ती से की जाए कि कहीं वह पैसा आतंकियों के हाथों में तो नहीं जा रहा है।

विकास का मुद्दा और वोट की राजनीति


इन दिनों लालू प्रसाद अपने रेल विकास कार्यों के नाम पर मतदाताओं से वोट मांग रहे हैं। यह राजनीति का नया विकास है। इससे पहले लालू प्रसाद जातीय समीकरण के आधार पर ही वोट मांगते और चुनाव जीतते या हारते रहे हैं। वे कहा करते थे कि ‘विकास से राजनीति का कोई संबंध ही नहीं है।’ पर ‘विकास बनाम पिछड़ापन’ को मुख्य मुद्दा बनाकर नीतीश कुमार ने न सिर्फ बिहार में सन 2005 में सत्ता हासिल कर ली, बल्कि लालू प्रसाद को भी अपना मुद्दा बदलने को मजबूर कर दिया। बिहार जैसे अविकसित प्रदेश के लिए यह खुशी की बात मानी जा रही है कि लालू प्रसाद जैसे महाबली नेता भी अब विकास पर जोर दे रहे हैं। हालांकि देश के पिछले कई चुनाव-नतीजे यह बताते हैं कि विकास के मुद्दे पर भी वोट मिलते रहे हैं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी दल की सरकार के विकास कार्यों को नजरअंदाज कर मतदाताओं ने उसे इस आधार पर वोट ही नहीं दिया। ऐसा सोचना ही इस गरीब देश के मतदाताओं का अपमान करना है, जो विकास के लिए तरसता रहता है।हालांकि यह कहना भी सही नहीं होगा कि सिर्फ विकास के नाम पर ही कोई दल दुबारा सत्ता में आ सकता है। चुनाव में जीत के लिए कुछ अन्य तत्व भी सहायक होते हैं, पर हाल के वर्षों के चार उदाहरण इस बात को साबित करते हैं कि विकास के नाम पर भी वोट मिलते ही रहे हैं। पहला उदाहरण अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के ‘इंडिया शाइनिंग’ यानी ‘भारत उदय’ के नारे का है। दूसरा उदाहरण आंध्रप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के विकास कार्यक्रमों का है। तीसरा उदाहरण सन 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव के मुद्दे का है। चौथा उदाहरण भी बिहार का ही है जो गत तीन साल में हुए छह उप चुनावों के नतीजों में परिलक्षित होता है। जिस भी दल की सरकार जहां जितना भी विकास कार्य करती है, उसे उसका लाभ मिलता ही है। हां, यदि अन्य चुनावी तत्व भी उन दलों के अनुकूल रहेंगे तो उनकी दुबारा सत्ता में आने की संभावना और ज्यादा बढ़ जाती है। इस बात को थोड़ा और बेहतर ढंग से समझने के लिए पहले चंद्रबाबू नायडू का उदाहरण लिया जाए। आंध्र प्रदेश में सन 1999 में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा का भी चुनाव हुआ था। तब नायडू के दल तेलुगूदेशम को विधानसभा चुनाव में 47.6 प्रतिशत मत मिले थे। नायडू मुख्यमंत्री बने पर, सन 2004 के आंध्र विधानसभा चुनाव में तेलुगूदेशम को मात्र 40.20 प्रतिशत वोट मिले और वे सत्ता से बाहर हो गए। नायडू की हार के बाद अनेक राजनीतिक व चुनावी विश्लेषकों की बन आई। उन लोगों ने यह फतवा देना शुरू कर दिया कि विकास के नाम पर वोट नहीं मिलते, पर जरा आंध्रप्रदेश की तब की राजनीतिक स्थिति को याद करिए। आंध्र प्रदेश में करीब 10 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है जो काफी संगठित और जागरूक है। सन 2002 में गुजरात में भीषण सांप्रदायिक दंगे हो चुके थे। तेलुगूदेशम और उसके नेता चंद्रबाबू नायडू से आंध्रप्रदेश के मुस्लिम नेताओं और अनेक प्रमुख लोगों ने कहा कि अब आप अटल बिहारी सरकार से समर्थन वापस ले लीजिए पर उन्होंने समर्थन वापस नहीं लिया, लिहाजा सन 1999 के चुनाव में जो अल्पसंख्यक वोट आम तौर पर नायडू की पार्टी को मिले थे, सन 2004 के चुनाव में पार्टी उस अल्पसंख्यक वोट से पूरी तरह वंचित हो गई। तेलुगूदेशम के घटे वोट-प्रतिशत को देखने से साफ हो जाता है कि यदि मुस्लिम मतदाताओं ने उसे 1999 की तरह ही 2004 में भी वोट दिए होते तो नायडू सत्ता से बाहर नहीं होते। यानी वे विकास के कारण नहीं हारे, बल्कि अल्पसंख्यक मतों का समर्थन न मिल पाने के कारण हारे। उसके बाद चंद्र बाबू नायडू भाजपा के साथ हाथ मिलाने का नाम तक नहीं लेते। नायडू के बारे में यह भी प्रचारित किया जाता है कि उन्होंने सिर्फ शहरों का विकास किया था। सवाल है कि क्या 40 प्रतिशत वोट सिर्फ शहरों के हो सकते हैं? क्या आंध्र के शहरों की आबादी इतनी अधिक है? बिलकुल नहीं।अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के छह साल के कामों पर भी विचार करें। सन 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 145 और भाजपा को 138 सीटें मिलीं। यानी इन दो प्रमुख दलों की सीटों में मात्र 7 सीटों का अंतर रहा। कल्पना कीजिए कि सन 2004 के लोकसभा चुनाव में रामविलास पासवान एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ते तो कैसा रिजल्ट आता? जाहिर है, 2004 के लोकसभा चुनाव में बिहार में जितनी सीटें यूपीए को मिलीं, उतनी ही एनडीए को मिलतीं। फिर केंद्र में किसकी सरकार बनती?इतना ही नहीं, अदूरदर्शी एनडीए ने अपने गलत राजनीतिक कदम के तहत तमिलनाडु में डीएमके को छोड़कर अलोकप्रिय होते एडीएमके को अपना लिया। नतीजतन उस प्रदेश में सन 2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए का भट्ठा बैठ गया। हरियाणा में आ॓म प्रकाश चौटाला से दोस्ती तोड़ना भी एनडीए के लिए महंगा साबित हुआ। सचाई यह है कि लोजपा, द्रमुक और चौटाला का दल पहले ही की तरह 2004 में भी एनडीए में ही होते तो ‘इंडिया शाइनिंग की जीत’ को भला कौन रोक सकता था?रामविलास पासवान, चौटाला और करूणानिधि यदि एनडीए से अलग हुए तो इसके लिए राजग ही जिम्मेदार था, न कि ये तीनों नेता। राम विलास पासवान से यदि बारी-बारी से रेल मंत्रालय और आईटी मंत्रालय नहीं छीना गया होता तो वे राजग में ही रहते। उधर धर्मांतरण विरोधी कानून पास कराने के कारण भाजपा को जयललिता में हिंदुत्व नजर आने लगा था। हाल में आ॓म प्रकाश चौटाला से फिर से समझौता करके भाजपा ने अपनी पिछली गलती सुधार ली है।कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विकास कार्यों के नाम पर राजग को 2004 में वोट तो मिले ही थे पर सिर्फ विकास कार्यों के नाम पर ही कोई पार्टी चुनाव जीत जाए, ऐसी स्थिति अभी इस देश में नहीं बनी है। इसके साथ-साथ दलीय और जातीय समीकरण पर भी एक हद तक ध्यान देना पड़ता है।अटल सरकार के इन्हीं विकास कार्यों के अंग के रूप में तत्कालीन केंद्रीय मंत्री नीतीश कुमार को बिहार में सड़क और रेलवे-क्षेत्र में अनेक विकासात्मक कार्य करने का मौका मिला। विकास कार्यों की तुलना लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों से करने पर जनता को नीतीश के काम बेहतर लगे। दूसरी आ॓र 2005 में लालू प्रसाद को बिहार विधानसभा चुनाव में रामविलास पासवान की मदद नहीं मिली। इस कारण राजद बिहार में फिर सत्ता हासिल नहीं कर सका और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बन गए। नीतीश के सत्ता में आने के बाद बिहार में विकास के मुद्दे ने वहां की राजनीति की दिशा ही बदल दी। नीतीश सरकार के दौरान बाद बिहार में लोकसभा और विधानसभा के तीन-तीन उपचुनाव हुए और तीनों मेें ही सत्ताधारी राजग की जीत हुई। फिर कौन कहता है कि विकास करने वालों को वोट नहीं मिलते?

Sunday, March 22, 2009

बिहार की फांस


बिहार में संप्रग के बीच मतभेद से सीधा लाभ अगर किसी को होगा तो वह है भाजपा एवं जद-यू गठजोड़। हालांकि यह बात तो संप्रग के नेताओं को भी पता है लेकिन यहां उनकी वही एकता गायब है जो सरकार में दिखाई देती है। लोजपा के नेता राम विलास पासवान के दबाव में लालू प्रसाद ने उन्हें 12 स्थान दिए और अपने लिए 25 रखे। कांग्रेस को तीन स्थान दिये गये। इसके साथ मान ही यह लिया गया कि बिहार में संप्रग का गठजोड़ हो चुका है। लेकिन कांग्रेस एवं राकांपा तो बिफरी ही, स्वयं राजद के अंदर भी फूट पड़ गयी। कारण ढूंढि़ए तो एक ही नजर आता है, कोई निजी स्तर पर स्वयं को संसद पहुंचने से वंचित मान रहा है तो ये दोनों दल यह मान रहे हैं कि उनके जितने सांसद हो सकते हैं, इस समझौते में उसे नजरअंदाज कर दिया गया है। कांग्रेस ने 2004 में चार स्थानों पर लड़कर तीन सीटें पाई थीं। उसे लगता है कि उसे इस बार ज्यादा स्थान मिलने चाहिए थे। कांग्रेस अगर बिहार में संप्रग का अंत मानकर स्वयं उम्मीदवार उतारती है तथा राकांपा भी घोषणानुसार 14 स्थानों से उम्मीदवार खड़े करती है तो फिर इनके बीच आपस में ही संघर्ष होगा। राजद के अंदर यदि कुछ नेता अपने ऐलान के अनुसार लोजपा एवं अपनी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ ताल ठोकेंगे तो इसका परिणाम क्या होगा यह बताने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन क्या यह स्थिति अस्वाभाविक है? कतई नहीं। वास्तव में सत्ता के लिए गठजोड़ की जो राजनीति की जा रही है यह सब उसकी स्वाभाविक परिणति है। सरकार के लिए एकत्रित होना एक बात है पर इससे दलीय प्रतिस्पर्धा का पूरी तरह अंत नहीं हो जाता। संसदीय अंकगणित में हर दल एवं व्यक्ति अपना संख्याबल मजबूत रखना चाहता है। उसे मालूम है कि उसकी औकात का आधार उसके सांसदों की संख्या ही है। इसलिए कोई आसानी से अपनी एक भी सीट दूसरे को लड़ने के लिए नहीं देना चाहता, जबकि व्यावहारिक तौर पर वे एक गठजोड़ के ही सदस्य होते हैं। बिहार ही क्योें, आप उत्तरप्रदेश में देख लीजिए, सपा एवं कांग्रेस के बीच चाहते हुए भी सहमति नहीं बन पा रही है। महाराष्र्ट्र में कांग्रेस एवं राकांपा के बीच कुछ सीटों पर रस्साकशी चल रही है। प. बंगाल में भी लंबे समय तक गतिरोध कायम रहा। उड़ीसा में भाजपा-बीजद गठजोड़ टूटने के कारण चाहे जो हों लेकिन बीजद का तर्क यही था कि भाजपा जितनी सीटें मांग रही थी उतने पर उनके जीतने की संभावना नहीं थी। साफ है कि गठजोड़ की राजनीति में सरकार या विपक्ष में एक साथ काम करते हुए भी नेताओं के बीच एक दूसरे के प्रति इतना संवेदनशील लगाव नहीं हो पाता कि वे अपनी एक-दो सीटों का भी दूसरे के लिए परित्याग कर दें।

Friday, March 6, 2009

लोकतंत्र का महायज्ञ


चुनाव आयोग द्वारा पांच चरणों में लोकसभा चुनाव आयोजित करने की घोषणा राजनीतिक दलों की इस मांग की अस्वीकृति है कि चुनाव कम चरणों में और कम समय में आयोजित किये जाएं। अधिकतर राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग के साथ बैठक में यह अनुरोध किया था कि चुनाव को ज्यादा लंबा न खींचा जाए। लगता है चुनाव आयोग जम्मू कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में कम समय में शांतिपूर्ण एवं निष्पक्ष मतदान को लेकर आश्वस्त नहीं था। लेकिन इतने लंबे समय तक चुनाव खींचने के कारण आचार संहिता की तलवार विकास कार्यो पर लटकी रहेगी। जाहिर है अगर चुनाव को लंबा खींचना था तो आचार संहिता में इतना संशोधन अवश्य होना चाहिए था ताकि आम विकास के कार्य इससे अप्रभावित रहें। खैर, चूंकि हमारे संसदीय लोकतंत्र का आधार आम चुनाव हैं, इसलिए हम इस स्थिति को झेलने के लिए तैयार हैं। बशर्ते चुनाव वाकई स्वतंत्र एवं भय रहित वातावरण में संपन्न हो जाएं। लंबे समय बाद लोकसभा के चुनाव परिसीमन के बाद संशोधित क्षेत्रानुसार आयोजित हो रहा है। 499 लोकसभा क्षेत्र ऐसे हैं जिनका परिसीमन हो गया है। जाहिर है ऐसे कई उम्मीदवारों के लिए नये क्षेत्र एवं नये मतदाता से रू-ब-रू होने की अग्नि-परीक्षा है तो कई सांसदों के लिए क्षेत्र ही नहीं बचा। जाहिर है लोकसभा चुनाव के परिणामों पर भी इसका असर होगा। वर्तमान विखंडित राजनीति में इतनी बड़ी संख्या में परिसीमित क्षेत्र राजनीतिक वर्णक्रम में कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य लाएंगे। हालांकि चुनाव आयोग के लिए इससे कोई अंतर नहीं पड़ने वाला। राष्ट्रव्यापी चुनाव प्रबंधन में जो कुछ परिसीमन के पूर्व करना होता था, वही अब भी होगा। इस नाते चुनाव आयोग की चुनौतियां पूर्ववत हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी 20 अप्रैल को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, इसलिए अंतिम चार चरण का चुनाव उनके उत्तराधिकारी नवीन चावला के नेतृत्व में संपन्न होगा। भाजपा जिस ढंग से नवीन चावला को निशाना बना रही है उसे चुनाव में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना सकती है। देश के मुख्य विपक्षी दल का मुख्य चुनाव आयुक्त पर विश्वास न करना ऐसी अशोभनीय स्थिति है जिसे टाले जाने की आवश्यकता है। यह नवीन चावला के लिए भी बहुत बड़ी चुनौती होगी। उनके लिए यह आवश्यक होगा कि वे स्वयं को अपनी भूमिका से बिल्कुल निष्पक्ष व पारदर्शी साबित कर दें। हम यही चाहेंगे कि हमारे लोकतंत्र का यह महायज्ञ आम मतदाता की पवित्र मत-आहुतियों से निर्विघ्न संपन्न हो जाए और चुनाव आयोग अपने तमाम विवादों से परे इसके निष्पक्ष वाहक बनें। उम्मीद करनी चाहिए कि राजनीतिक दल भी चुनाव आयोग के संदर्भ में अपने राजनीतिक मतभेदों से परे हटकर इस महाअभियान को शांतिपूर्ण एवं निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराने में योगदान करें।

तीसरे मोर्चे की कवायद


चुनाव की घोषणा के साथ तीसरे मोर्चे की कवायद आम मतदाता की नजर में मूलत: एक राजनीतिक प्रहसन है। हालांकि माकपा के नेतृत्व वाला वाममोर्चा पिछले साल की शुरुआत से ही तीसरे विकल्प की बात करने लगा था और उसने कुछ कोशिशें भी कीं लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में यह सफल न हो सका। वास्तव में राजनीति के चरित्र एवं विकास नीतियों में मौलिक बदलाव के आंदोलन की भावना से यदि तीसरा मोर्चा अस्तित्व में आए तो उसका स्वागत किया जाएगा, लेकिन आसन्न चुनाव के पहले इसका उद्देश्य केवल संगठित होकर सत्ता समीकरण में अपनी ताकत बढ़ाना ही हो सकता है। ठीक यही बात चुनावोपरांत ऐसे मोर्चे के गठन के संदर्भ में भी कही जा सकती है। तीसरा मोर्चा यानी कांग्रेस तथा भाजपा से अलग राजनीतिक समूह। वैसे तीसरे मोर्चे के मुख्य निशाने पर भाजपा रहती है और इसका आधार तथाकथित सेक्यूलर राजनीति को बनाया जाता है। तर्क यह होता है कि भाजपा चूंकि सेक्यूलर विरोधी है, इसलिए सेक्यूलरवाद को बचाने के लिए वे इकट्ठे हो रहे हैं। यह बात अलग है कि जो दल सेक्यूलरवाद की दुहाई देकर तीसरा मोर्चा या संप्रग का भाग होते हैं उनमें से कई भाजपा के साथ हाथ मिला चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा तीसरे मोर्चे के लिए सबसे ज्यादा सक्रिय हैं। उनकी पार्टी कर्नाटक में भाजपा के साथ सरकार चला चुकी है। अन्नाद्रमुक की जे. जयललिता भाजपा गठजोड़ में शामिल रही हैं। तेलुगूदेशम भी भाजपा नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देने के साथ मिलकर चुनाव लड़ चुका है। इस प्रकार इनकी विख्ासनीयता समाप्त है। देवेगौड़ा की तीसरे मोर्चे के लिए सक्रियता का उद्देश्य क्या हो सकता है? पांच सालों तक लोकसभा में रहते हुए भी सत्ता समीकरण या विपक्षी गठजोड़ में कहीं उनकी कोई भूमिका नहीं थी। चन्द्रबाबू नायडू को इस समय अपने मुस्लिम मतों की चिंता सताने लगी है। वामदलों के लिए तो तीसरा मोर्चा केन्द्रीय राजनीति में महत्ता कायम रखने का एकमात्र आधार है। अगर भाजपा एवं कांग्रेस से अलग कोई मोर्चा न हो तो फिर वे नेतृत्व किसका करेंगे। ऐसी पृष्ठभूमि से किसी राजनीतिक समूह का आविर्भाव होता है तो उसकी विख्ासनीयता क्या होगी? वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में किसी सशक्त तीसरे मोर्चा का उभरना वैसे ही असंभव है। तेलूगु देशम के चन्द्रबाबू नायडू, जनता दल सेक्यूलर के देवेगौड़ा के अलावा ऐसा कोई दल निश्चित तौर पर तीसरे मोर्चा का भाग बनने को अभी तैयार नहीं है। जयललिता जब तक औपचारिक तौर पर इसका भाग बनने की स्वयं घोषणा नहीं करतीं, उनके बारे में कुछ भी कहना संभव नहीं है। अच्छा होगा कि वामदल तीसरे मोर्चे के गठन के प्रयास की बजाय अपनी सीटों को बचाने पर ध्यान केन्द्रित करें।

Friday, February 20, 2009

भ्रष्टाचार के विरुद्ध

पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम को आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी करार दिए जाने का फैसला तेरह साल बाद आया ह
ै। अगर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे राजनेताओं पर कानूनी शिकंजा कसने की यही गति रही तो करप्शन पर पूरी तरह रोक लगाने का सपना शायद ही कभी पूरा हो। सचाई तो यह है कि सभी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा दोहराते रहते हैं, पर आज तक उन्होंने गंभीरता से इस बात के लिए प्रयास नहीं किया कि करप्शन के मामले में त्वरित कार्रवाई हो और भ्रष्ट लीडर को सजा दिलाई जा सके। उलटे कई सरकारों पर ऐसे मामलों को लटकाने और इसके लिए सरकारी एजंसियों का इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं।

करप्शन का मामला राजनीतिक ब्लैकमेलिंग का भी हथियार बन गया है। भ्रष्ट नेताओं से किनारा करने की बात तो दूर, ज्यादातर पार्टियां ऐसे लोगों को ससम्मान चुनाव में टिकट और पार्टी संगठन में अहम पद दे रही हैं। सुखराम के मामले को ही देखें तो राजनीतिक दलों के दोमुंहेपन का पता चलता है। वर्ष 1996 में दूरसंचार घोटाले के सामने आने के बाद सुखराम को कांग्रेस से निकाल दिया गया। तब उन्होंने 'हिमाचल विकास कांग्रेस' नामक अलग पार्टी बना ली। सुखराम के मामले पर शोर मचाने वाली और इस पर संसद की कार्यवाही तक ठप कर देने वाली बीजेपी ने हिमाचल प्रदेश में सुखराम की पार्टी से समझौता करने में कोई संकोच नहीं दिखाया। यह जानते हुए भी कि सुखराम पर कितना गंभीर मामला चल रहा है, कांग्रेस ने 2004 में उन्हें फिर से गले लगा लिया और उनकी पार्टी का विधिवत कांग्रेस में विलय हो गया। कांग्रेस के लिए सुखराम कितने अहम हैं, इसका अंदाजा तब लगा जब राहुल गांधी पिछले विधानसभा चुनाव में उनके बेटे के पक्ष में प्रचार करने हिमाचल प्रदेश पहुंच गए। इस बार के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सुखराम को मंडी से टिकट देने पर विचार कर रही थी। कांग्रेस और बीजेपी ने साफ भुला दिया कि सुखराम के घरों पर मारे गए छापे में घर के कोने-कोने से नोटों के बंडल निकले थे और अदालत ने न सही, पर जनता ने उन्हें उसी वक्त दोषी मान लिया था। करप्शन के खिलाफ लड़ाई सिर्फ नारों से नहीं लड़ी जा सकती, इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है जिसका दुर्भाग्य से अधिकतर दलों में अभाव दिखता है। शायद यही वजह है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध बने तमाम नियम-कानून धरे के धरे रह जाते हैं। यह एक गंभीर मसला है जिस पर समाज के सभी वर्गों को विचार करना होगा।

Thursday, February 12, 2009

जूतों और चप्पलों कि राजनीति.................

उत्तर प्रदेश, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश विधानसभा में जो कुछ हुआ वह नहीं होना चाहिए था। उन्होंने राज्पाल के साथ दुर्व्यवहार किया और उन्हें अभिभाषण पढ़ने से रोककर संवैधानिक मर्यादाओं को तार-तार किया। विपक्षी दलों को राज्य में बिगड़ रही कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार या किसानों की समस्या को उठाने का पूरा हक है, पर उसके लिए यह अवसर नहीं था। यह कैसी विडंबना है कि एक तरफ तो वे पार्टियां राज्य में कानून और व्यवस्था कायम करना चाहती हैं, लेकिन दूसरी तरफ सदन में खुद संवैधानिक व्यवस्था की धज्जियां उड़ा रही हैं। शुरुआत उत्तर प्रदेश से हुई और ऐसा लगता है जैसे संक्रमण उड़ीसा और आंध्र प्रदेश तक फैल गया। तीनों के कारण अलग-अलग थे लेकिन हमारे जनप्रतिनिधियों का आचरण एक जैसा था।
आपको जो कुछ कहना है सदन के नियमों के अंतर्गत कह सकते हैं। किंतु धीरे-धीरे नियमों एवं प्रक्रियाओं के पालन की परंपरा खत्म होती जा रही है। यह स्थिति विधानसभाओं से शुरू होकर संसद तक पहुंच गई है। संसद के दोनों सदनों के अध्यक्षों की टिप्पणियां इस बात के प्रमाण हैं कि सदन के भीतर सदस्यों के हंगामों से वे कितनी बार विचलित हुए हैं। हालांकि यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि बातचीत में सभी राजनीतिक दल इस रवैये को अनुचित ठहराते हैं पर सदनों के भीतर उनका यह विचार आचरण में नहीं बदल पाता। क्या पक्ष, क्या विपक्ष- सबकी दशा एक जैसी है। जब ये सरकार में होते हैं तो विपक्ष के ऐसे रवैये की आलोचना करते हैं पर जब ये विपक्ष में आते हैं तो स्वयं उसी आचरण पर उतर जाते हैं।
राजनीतिक विरोध प्रदर्शन तो लोकतंत्र की शोभा है किंतु इसकी जगह विधानसभा नहीं हो सकती। इसके लिए आप सड़कों पर उतरिए और अहिंसक तरीके से अपना धरना-प्रदर्शन करिए। राज्य विधायिकाएं या केन्द्रीय संसद में आप गंभीर विषय बहस के लिए लाइए, अपने प्रश्नों से सरकार को कठघरे में खड़ा करिए, जन समस्याओं से जुड़े मुद्दों पर सदन का ध्यान खींचिए, सरकार को काम करने के लिए मजबूर करिए। उ। प्र. में तो आज से विधानसभा एवं विधान परिषद का सत्र आरंभ होना था। राज्यपाल परंपरानुसार दोनों सदनों को संयुक्त रूप से संबोधित करनेवाले थे। यह एक ऐसी परंपरा है जिसका हर हाल में पालन होना चाहिए था। किंतु उप्र में विपक्षी सदस्यों ने राज्यपाल तक को अपना अभिभाषण नहीं देने दिया और उन्हें कुछ मिनटों में ही इसकी औपचारिकता पूरी कर लौटना पड़ा।
जब हमारे माननीय राज्यपाल तक का अभिभाषण नहीं सुन सकते तो फिर वे अपने प्रतिस्पर्धी नेताओं की बात कैसे सुन सकते हैं। उसमें सत्तारूढ़ बसपा तथा भाजपा को छोड़कर सभी दल के विधायक शामिल थे। भाजपा ने हंगामे की जगह बहिष्कार का रास्ता चुना। वास्तव में असहिष्णुता अब राजनीतिक व्यवहार का अंग बन चुकी है। कोई यह समझने को तैयार नहीं है कि उनके हाथों ही हमारे लोकतंत्र का भविष्य है। कोई माइक तोड़ने की कोशिश करे, कोई सदन में काले झंडे दिखाए या फिर राज्यपाल की ओर कागज का गोला फेंके तो इन सबसे कैसा परिदृश्य बनता है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अपनी जगह है लेकिन वह उस सीमा तक न चली जाए जहां जन प्रतिनिधि होने का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाए। हम तो यही निवेदन करेंगे कि भारी बलिदानों के बाद हमने आजादी हासिल की और हमारे आरंभिक नेताओं ने अपने आचरण से जो परंपरा कायम की, कम से कम उसे ध्वस्त न करें।

Monday, February 9, 2009

यह कौन सी संस्कृति है?


अब मेंगलोर कांड को मीडिया ने उछाला और मीडिया के इस उछाले को पूरे देश ने तमाशबीन की तरह देखा। एक हिंदूवादी सेना के कथित जांबाज बहादुर धर्मरक्षक, सुसंस्कृत सैनिकों ने कुछ निहत्थी- निरीह ‘पापिन, हीन चरित्र’ ‘पब-गमना’ कन्याओं पर आक्रमण करके भारत नहीं तो कम-अज-कम हिंदू और भारतीय संस्कृति को नष्ट होने से बचा लिया। या बचाने का एक ‘साहसिक’ प्रयास तो अवश्य ही किया। क्योंकि यह प्रयास उन अति विशष्टि प्रयासों में से एक था, जिन पर मीडिया अपनी गिद्ध दृष्टि जमाये रहता है, अपना पेट भरने के लिए, इसलिए यह अपनी पूरी विशष्टिता के साथ मीडिया में कूदा और अपने बिगड़ैल भतीजे राज ठाकरे की तर्ज पर एक-दो ऐसे नाम जिनके पास वास्तविक काम के नाम पर सिवाय राम नाम के और कुछ नहीं है उछल कर राष्ट्रीय व्यक्तित्व बन गये। मेरे उनको यहां स्मरण करने से उनकी नवर्जित राष्ट्रीय प्रतिष्ठा को क्षति पहुंच सकती है इसलिए मैं उनको स्मरण-श्रद्धांजलि नहीं दे रहा हूं।वैसे भी मीडिया का टीआरपी मंडित चरित्र घटना पर टूटता है, परिघटना पर नहीं। हां, जब घटना पर टूटता है तो उसे परिघटना जैसा लबादा जरूर आ॓ढ़ा देता है। कुछ सिरफिरे या उन्हें जो कुछ कहिए अति हिंदू संस्कृतिवादी एक पब पर हमला कर देते हैं तो एक बड़ी बात हो जाती है, मगर करोड़ों हिंदू किसी पब पर कोई हमला नहीं करते और पबों की बात छोड़ दें, चकलों तक को सहजता से चलने देते हैं, तो यह होना कोई बात नहीं माना जाता। कहीं-कभी दो संप्रदाय आपस में भिड़ बैठते हैं या एक संप्रदाय के कुछ सिरफिरे लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों के साथ कोई अतिवादी, आतंकवादी व्यवहार कर बैठते हैं तो बड़ी बात हो जाती है, मगर इन्हीं दो संप्रदायों के करोड़ों लोग सहजता से साथ-साथ रह रहे हैं तो यह कोई बात नहीं है। इतनी सी भी बात नहीं है कि इस सहज पारस्परिक व्यवहार की खूबियां बताकर सिरफिरों के दिमाग में कुछ अच्छी बातें बिधने की बात भी की जा सके। मीडिया एकदम उलट-गुलाटी मारता है। वह सिरफिरों की सिरफिरी हरकतों को करोड़ों शांत दिमागों में मार-मार कर घुसा डालता है और उन्हें भी सिरफिरी अशांति से भर देता है।बहरहाल, मीडिया की महत्ता-महानता एक दीगर विषय है, यहां बात पब, पब में जाने वाली लड़कियों और उनके भारतीय या हिंदू संस्कृति के लिए पैदा हुए खतरे की है। पब केवल हिंदू संस्कृति को ही खतरा नहीं लगते, उससे भी बड़ा खतरा तो इस्लामी संस्कृति को लगते हैं। स्वयं इस्लामी संस्कृति की बात इसलिए उठाना जरूरी लगा कि सिरफिरों की पब आक्रमकता को मीडिया ने ‘तालिबानीकरण’ से जोड़ा, यानी जिस तरह से तालिबान इस्लाम के नाम पर जो ‘शुद्धतावादी’ कार्यक्रम चलाते हैं, वैसा ही शुद्धतावादी कार्यक्रम ये हिंदू तालिबान चलाना चाहते हैं।इसके अलावा बहुत सी राजनीतिक बातें थीं कि सेना नायक अपनी राजनीति चमकाना चाहता था इसलिए उसने अन्य किसी हथकंडे के बजाय बकरेकंडे का प्रयोग किया, कि यह सरकार को बदनाम करने का सुनियोजित षड्यंत्र था, कि यह इस्लामी कट्टरंथी संगठनों की कार्यनीति की अनुक्रिया थी आदि-आदि। अब ये सारी बातें अलग, आधारभूत सवाल तो पब, कथित ‘नग्न-अर्धनग्न’ लड़कियों का पब-गमन और इनसे आहत होती हिंदू संस्कृति का है। पब क्यों खुल रहे हैं’ इन पबों को कौन और किसलिए खोल रहा है। जिस आर्थिक नीति को हमने प्रगति का मूल मंत्र बनाया हुआ है, उसके चलते क्या पबों की जगह चैत्यालय खुलेंगे, ये सारे सवाल विचारणीय हैं, और इन पबों का सामाजिक प्रभाव भी विचारणीय है, तथापि यहां विचारणीय सवाल यह है कि क्या चंद निहत्थी लड़कियों पर हमला करके, या पार्कों में बैठे जोड़ों को सरेआम अपमानित करके, ऐसे मिलन स्थलों में तोड़-फोड़ करके क्या सचमुच हिंदू संस्कृति की रक्षा की जा सकती है? और क्या इस तरह के हमले सचमुच हिंदू संस्कृति के हिस्से हैं? या किसी भी सभ्य, जीवंत, सजग व्यवहार संस्कृति के हिस्से हो सकते हैं?पहली बात तो यह कि कोई भी ऐसा अनुदार, अभद्र, पश्चगामी कृत्य किसी दूसरे के ऐसे ही अभद्र, अनुदार, कट्टर और क्रूर हत्या का प्रत्युत्तर नहीं हो सकता। किसी दूसरे की खाज का जवाब अपने शरीर पूर कोढ़ पैदा कर के नहीं दिया जा सकता। हिंदू उग्रवादी संगठन प्राय: ऐसा ही करते प्रतीत होते हैं! दूसरे, कोई भी सांस्कृतिक परिवर्तन या नियंत्रण अभद्र और क्रूर व्यवहार द्वारा नहीं हो सकता। पब में जाने वाली लड़कियां अगर अभद्र-अश्लील सांस्कृतिक व्यवहार कर रही थीं तो उन पर हमला करने वाले उनसे हजार गुना अधिक अभद्र, अश्लील और अपसांस्कृतिक व्यवहार कर रहे थे। तीसरी बात यह कि यह वैसा ही व्यवहार था जैसे दांत खोले भेड़िये पर आपका कोई वश न चले और अपना डंडा मेमने पर फटकारने लगे। इस देश में पब संस्कृति फैलाने वालों का आप कुछ नहीं उखाड़ सकते, इसलिए पब जानेवाली कमजोर लड़कियों पर ही टूट पड़ो। यह सिर्फ दिमागी विकृति है।ये स्वयंभू हिंदू संगठन अगर सचमुच हिंदुओं का भला चाहते हैं तो न तो इन्हें इस तरह के कायरतापूर्ण कार्य करने चाहिए और न औरों को करने देने चाहिए। जरूरत हिंदुओं को आंतरिक तौर पर मजबूत होने और बनाने की है। और वे ऐसा तब कर सकते हैं जब वे अपनी सामाजिक आंतरिक कमजोरियों से लड़ें और अपनी अंतर्निहित कायरता से लड़ें। कायरता से लड़ने की लड़ाई वैचारिक ज्यादा होती है, जिससे इस तरह के संगठन लगातार बचते हैं। कुछ बम फोड़कर, निर्दोषों पर गोलियां चलाकर यह काम कर करना चाहते हैं, तो कुछ निर्दोषों की पिटाई करके। ये सिर्फ कायरतापूर्ण कार्य हैं। जो समाज इस तरह के कायरतापूर्ण कार्यों को पैदा करता है, समर्थन देता है या क्रियान्वित करता है, उसके पतन को ऊपरवाला भी नहीं रोक सकता।

Sunday, February 8, 2009

भाजपा का राग


नागपुर में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी एवं राष्ट्रीय परिषद से जो स्वर उभरे हैं, उन्हें चुनावी सुर के अलावा और कुछ नहीं कहा जा सकता। आसन्न लोकसभा चुनाव के पूर्व पार्टी के इस जमावड़े से अन्य किसी संदेश की उम्मीद की भी नहीं जा सकती। ऐसे समय में किसी भी पार्टी का आयोजन चुनाव पर ही केंद्रित होगा। इसलिए भाजपा ने चाहे गांधी को आर्थिक संकट से मुक्ति का उपाय माना हो या फिर राम मंदिर निर्माण को अपने एजेंडे में होने का एलान, इसे पूरा देश चुनावी नजरिए से ही देखेगा। भाजपा चुनाव में इनका उपयोग किस तरह करती है, इसके बारे में नागपुर प्रस्ताव शांत है, इसलिए हमें चुनाव अभियान आरंभ करने का इंतजार करना होगा। वैसे गांधी का नाम पार्टी ने पहली बार नहीं लिया है। 1980 में पार्टी ने स्थापना के समय गांधीवादी समाजवाद को सिद्धांत के तौर पर अपनाया था, जिसे बाद में हटा दिया गया। पार्टी अध्यक्ष ने रामसेतु मामले पर संप्रग सरकार की खिंचाई करके राम नाम के उपयोग का एक रास्ता दिखाया है और यह चुनाव मैदान में गूंजेगा अवश्य। गांधी और राम-- भाजपा के लिए चुनावी दृष्टि से कितने लाभकारी होेंगे, इस बारे में भी अंतिम मत व्यक्त करना कठिन है। हां, आर्थिक मंदी के लिए सरकार की नीतियों को विफल करार देने, आतंकवाद के मोर्चे पर लचर रवैया अपनाने, घुसपैठ आदि को नजरअंदाज करने आदि आरोपों से इसने सरकार के खिलाफ चुनावी मुद्दों की एक फेहरिस्त हमारे सामने रख दी है। चुनाव के पूर्व हर पार्टी अपने समर्थक वर्ग को खींचने के लिए अपने नजरिए से मुद्दे सामने लाती है और भाजपा को भी अपने मुद्दे सामने रखने का अधिकार है। किंतु, वह समर्थक दलों के साथ शासन हाथ में लेने के लक्ष्य से चुनाव मैदान में उतर रही है, इसलिए उसे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के घटक दलों के स्वर के साथ स्वर देना है। यह उसके कुछ मुद्दों पर मुखर होने के रास्ते की बाधा है, इसलिए कई मामलों में उसके स्वर मद्धिम सुनाई पड़े हैं। गठबंधन में भाजपा के लिए हमेशा से अपने साथी दलों के साथ संतुलन बनाने की चुनौती है, जिसका असर उसके प्रस्तावों एवं नेताओं के भाषणों में साफ दिखाई देता रहा है। नागपुर भी इससे अछूता नहीं है। इसे गठबंधन की मजबूरी कह सकते हैं या फिर सत्ता पाने के लिए समझौता। सब देखने वाले के नजरिए पर है। इस मायने में भाजपा अकेली नहीं है। ये बातें इस समय ज्यादातर दलों पर लागू हो रही हैं। भाजपा ने शायद इसे संतुलित करने के लिए गांधी का नाम सामने लाया है। गांधी एक ऐसा नाम है, जिस पर अंबेडकरवादियों सहित दलित-राजनीति करने वाले नेताओं को छोड़कर किसी का विरोध नहीं है। यानी यह सर्वाधिक स्वीकृत है और गांधी का वारिस कहने वाली कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करने का एक बड़ा अस्त्र भी।

Friday, February 6, 2009

पटेल दूर, नेहरू निकट क्यों थे बापू के.....


बात गत सदी की है। छह दशक पुरानी। आखिर महात्मा गांधी ने वल्लभभाई पटेल को क्यों गौण किए रखा और जवाहरलाल नेहरू के प्रति क्यों पक्षपाती रहे? भारत के सोशलिस्ट, खासकर जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया जो नेहरू का जयघोष करते थे, का जब मोहभंग हुआ तो इन्होंने अपनी ‘ऐतिहासिक भूल’ को माना। कालचक्र तब तक घूम चुका था। आज भी यह यक्ष प्रश्न है कि रघुकुल में जन्मे राम के अनन्य भक्त, सत्य वचन पर सदैव अडिग, अति मानवीय गुणवाले गांधीजी ने भेदभाव क्यों किया? कहीं उनकी अवचेतना में यह तो नहीं था कि वे और पटेल एक ही भाषा (गुजराती) बोलते हैं। आजादी के आंदोलन में हिन्दीवालों की बहुलता थी, अत: नेतृत्व उन्हीं का होना चाहिए। वह दौर भी द्विज वर्ण के वर्चस्व का था। रंग-रूप से ठेठ गंवई भारत में शिक्षित पटेल कुर्मी थे। नेहरू पाश्चात्य शैली में रंगे, विदेश में पढ़े, लोहित वर्ण के विप्र थे। उनके जीवन के चौथे चरण (आयु 76 वर्ष) में गांधीजी के मुतल्लिक ये बातें क्षुद्र लगेंगी। आध्यात्मिक उत्कर्ष के शीर्ष सोपान पर पहुंचे बापू जरूर राग-द्वेष से परे तो रहे होंगे, मगर सारथी भी तो ईश्वर था जो कुरूक्षेत्र में पार्थ के प्रति अनुरागी था।एक दस्तावेजी घटना (1946 की) है, जिससे लगता है कि गांधीजी ने नेहरू को अन्य के मुकाबले बचाया, बढ़ाया और प्रायोजित किया। भारत सरकार के फिल्म प्रभाग की (इंदिरा गांधी युग में निर्मित) डाक्युमेंटरी ‘सरदार पटेल’ शीर्षक से है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में मौलाना आजाद की जगह नया कांग्रेस अध्यक्ष चुना जाना था। गांधीजी ने सदस्यों को सूचित किया कि लगभग सारी प्रदेश समितियों ने सरदार पटेल का नामांकन भेजा। नेहरू के लिए प्रस्ताव नगण्य थे! फिर बापू ने पटेल की आ॓र मुखातिब होकर कहा, ‘सरदार, मैं चाहता हूं कि तुम जवाहर के पक्ष में अपना नामांकन वापस ले लो।’ सिर्फ दो शब्द में पटेल ने उत्तर दिया : ‘जी बापू।’ नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बन गये और कुछ महीनों में अन्तरिम सरकार के प्रधानमंत्री भी।यूं इतिहास में ढेर सारे उदाहरण हैं, जिसमें राष्ट्र-नायकों और उनके उत्तराधिकारियों में विचार- वैषम्य उभरा है। व्लादिमिर लेनिन के निधन के बाद जोसेफ स्टालिन ने उनकी विचारधारा ही उलटा दी। माआ॓ जेडोंग के पूंजीशाही जानशीनों ने कम्युनिज्म को माआ॓ के शव के साथ संलेपित कर उनके ताबूत में सील बंद कर दिया। नेहरू ने तो बापू के जीते जी उन्हें नकार दिया था। अपनी डायरी में 1936 में नेहरू ने लिखा कि वे निश्चित राय के हैं कि बापू के साथ सहयोग मुमकिन नहीं है। ‘हम दोनों को अब अलग राहें लेनी पड़ेंगी।’ उन्हीं दिनों गांधीजी ने अपने अंग्रेज मित्र अगाथा हैरिसन को लिखा था : ‘जवाहर अब मेरा नहीं रहा। मुझे उसके तौर-तरीके पसंद नहीं हैं।’ गांधीजी के सत्याग्रह आंदोलन पर नेहरू ने जो कहा, उसे पत्रकार लुई फिशर ने अपनी पुस्तक ‘गांधी, उनका जीवन और विश्व को संदेश’ में दर्ज किया है। नेहरू ने बापू को 13 अगस्त, 1943 को लिखा- ‘इस बार जेल आना मेरी धमनियों के लिए कठिन परीक्षा जैसा है।’ गांधीजी के संघर्ष–दर्शन पर अपनी शंका नेहरू ने 1942 में व्यक्त की। तब वे चक्रवर्ती राजगोपालाचारी से सहमत थे कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में ‘भारत छोड़ो’ जैसा आन्दोलन ब्रिटेन को जर्मनी के खिलाफ लड़ने में कमजोर कर देगा। राजगोपालाचारी ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव का विरोध और पाकिस्तान की मांग का खुलकर समर्थन किया था, मगर बाद में समय की नजाकत को भांपकर नेहरू मुंबई अधिवेशन में शरीक हुए और गांधीजी का समर्थन किया। वे तब तीन वर्ष (9 अगस्त, 1942 से 14 जुलाई, 1945) तक अहमदनगर किले की जेल में कैद रहे।संघर्ष से थकान ही थी कि नेहरू और अन्य कांग्रेसी नेता हर कीमत पर ब्रिटेन से समझौता चाहते थे, भले ही भारत का विभाजन हो जाय। गांधीजी ने कहा था कि विभाजन उनकी लाश पर होगा। यह नाथूराम गोड्से ने सचकर दिखाया, जब पाकिस्तान बनने के साढ़े पांच महीनों में ही गांधीजी की हत्या कर दी गई। गांधीजी और नेहरू की दूरी सदैव के लिए हो गई, जब संगम तट पर बापू का नेहरू ने अस्थि विसर्जन किया। वही तब श्रद्धाजंलि जनसभा में नेहरू के भाषण के बाद सम्पादक दुर्गादास के कान में रफी अहमद किदवई ने कहा, ‘जवाहरलाल ने आज गांधीजी ही नहीं, बल्कि गांधीवाद का भी अंतिम संस्कार कर दिया।’ (फ्रॉम कर्जन टु नेहरू : दुर्गादास)। गांधीजी ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को भारतीय धरती पर रोपित करने के विरूद्ध थे, क्योंकि इसके तहत दो वर्ग- शासक और शासित ही पैदा होते हैं। राजकाज में जन सहभागीदारी नहीं हो सकती। गांधीजी ने ‘हिन्द स्वराज’ में लिखा था : ‘ब्रिटिश संसद बांझ है, वारांगना है।’ बांझ इसलिए कि इसने एक भी जन कल्याणकारी कार्य नहीं किया। वेश्या इसलिए कि सांसद भिन्न किस्म के प्रभावों तथा दबावों के तहत काम करने के लिए लाचार होते हैं, मगर नेहरू ने पूरी ताकत जुटा कर यह किया। इसी परिवेश में गांधीजी और नेहरू के परिवारों की राजनीतिक क्रियाशीलता की तुलना भी हो जाए। जवाहरलाल नेहरू लाहौर में दिसम्बर, 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष उनके निवर्तमान अध्यक्ष पिता मोतीलाल नेहरू के स्थान पर बने थे। महात्मा गांधी ने पद को अस्वीकार कर दिया था। तब पिता द्वारा पुत्र हेतु आग्रह को गांधीजी ने स्वीकार किया था। महात्मा गांधी के परिवार के आज 54 लोग हैं। जो दिवंगत हो गये, वे तो सत्ता से दूर-दूर ही रहे, क्योंकि गांधीजी ने किसी को आने नहीं दिया। अलबत्ता, सत्याग्रही बनाकर उन्हें जेल भेजते रहे। केवल दो का नाम आता है, जो राजनीति की परिधि के इर्द-गिर्द रहे। जैसे उनके पौत्र गोपाल कृष्ण गांधी जो विदेश सेवा की नौकरी में थे, आज पश्चिम बंगाल के राज्यपाल हैं। उन्हीं के भाई राजमोहन गांधी लेखक हैं और बस एक बार उन्होंने अमेठी से राजीव गांधी के विरूद्ध लोकसभा का चुनाव 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के दौर वाले जनता दल के टिकट पर लड़ा था, मगर उनके अग्रज रामचंद्र गांधी नई दिल्ली के बंगाली मार्केट के सेंट्रल लेन स्थित एक गैरेज के ऊपर निर्मित कमरे में रहे। उनके निधन के दिन वहां के चौकीदार को पता चला कि महात्मा गांधी के सत्तर वर्षीय लेखक पौत्र रामचन्द्र का जून, 2007 में निधन हो गया। तो क्या इन सब तथ्यों पर गौर करने के बाद भी कुछ सोचने हेतु शेष रह जाता है कि गांधीजी क्या थे, कैसे थे और आज उनकी याद कितनी बची है?

खेती में पिछड़ता भारत


पिछले दो दशकों में भले ही अन्य क्षेत्रों में हम अव्वल साबित हुए हों लेकिन, खाघ उत्पादन में हम पड़ोसी मुल्कों से भी पिछड़ गए हैं। पिछड़ने का दर्द इसलिए भी ज्यादा है कि हमारी गिनती कभी कृषि प्रधान देशों में होती थी, हमारे यहां औसत कृषि जोत अब भी ज्यादा है और पड़ोसी देशों से एक समान सामाजिक पृष्ठभूमि साझा करते हैं। लेकिन आलम ये है कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ की खाघ फसलों की उत्पादकता वृद्धि दर में हम गए गुजरे हैं। इसका मतलब ये कतई नहीं है कि भारत कृषि उत्पादन में पड़ोसी मुल्कों से पिछड़ गया है। दरअसल कृषि उत्पाद में हम आज भी दक्षिण एशियाई देशों में दिग्गज हैं लेकिन, खाघ फसल मसलन, गेहूं, चावल, दाल की पैदावार वृद्धि दर में हमारी स्थिति पहले की तुलना में बदतर हुई है। यह चिंता की बात है, न केवल किसानों के लिए बल्कि आम नागरिकों के लिए भी क्योंकि पेट की भूख मिटाना सबकी प्राथमिकता में शामिल है। इसके अलावा ये इस मायने में खतरे की घंटी भी है कि कहीं खेती-किसानी प्रधान मुल्क भारत का अस्तित्व ही तो नहीं मिट रहा है। खाघ उत्पादन के मामले में हमारे दावे कितने सही हैं, इसका अंदाजा नवंबर 2008 में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ के कृषि मंत्रियों की हुई बैठक में चला। नई दिल्ली में हुई इस बैठक में सभी आठ देशों ने खाघ फसलों के उत्पादन संबंधी दस्तावेज एक दूसरे से साझा किए। इसके अलावा बैठक में संयुक्त राष्ट्र खाघ एवं कृषि संगठन (एफएआ॓) की नीतियों पर भी चर्चा हुई। जो बात प्रमुखता से उभर कर सामने आई वो है, फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के मामले में भूटान पहले स्थान पर है। यहां तक कि नेपाल, अफगानिस्तान और बांग्लादेश भी पिछले दो दशकों में खाघ फसलों की उत्पादन दर में भारत से आगे हैं। अब चावल को ही लीजिए, सार्क देशों में चावल की खेती बड़े पैमाने पर होती है। भारत में तो इसकी खेती और भी बड़े पैमाने पर की जाती है। हालांकि अब भी विश्व के चुनिंदा चावल उत्पादक देशों में हमारी गिनती होती है। लेकिन इसकी औसत वृद्धि दर 1991-93 और 2005-07 के बीच भारत में महज 1.21 फीसद रही। जबकि भूटान में सबसे ज्यादा 3.37 फीसद दर्ज की गई। इसी दौरान बांग्लादेश में 2.6 फीसद की बढ़ोतरी हुई। यही नहीं, पाकिस्तान और श्रीलंका में 1.80 और 1.40 फीसद क्रमश: दर्ज की गई। जहां तक गेहूं उत्पादन की बात है तो सार्क देशों की यह दूसरी प्रमुख खाघ फसल मानी जाती है। यहां भी अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान हमसे आगे हैं। अफगानिस्तान में सबसे ज्यादा वृद्धि दर 3.44 फीसद रही। दूसरे पायदान पर नेपाल 3.39 फीसद के साथ रहा। जबकि भारत 0.86 फीसद के साथ पांचवें पायदान पर खिसक गया। कहने के लिए कहा जा सकता है कि इन सालों के बीच उत्पादकता के लिहाज से मानसून अनुकूल नहीं रहा है, जो कि अफगानिस्तान और नेपाल पर लागू नहीं होता है। लेकिन इस तर्क को ज्यादा सटीक नहीं माना जा सकता, इसलिए कि यही मानसून श्रीलंका और बांग्लादेश पर भी लागू होती है। अगर हम कुल अनाज उत्पादन के लिहाज से भारत की तुलना दूसरे सार्क देशों से करें तो भारत श्रीलंका के साथ अंतिम पायदान पर नजर आता है। भूटान में सबसे ज्यादा वृद्धि दर 5.12 है और भारत का 1.46 फीसद है। ये हाल तब है जबकि हमारे यहां औसत कृषि जोत सबसे ज्यादा है, देश की कुल आबादी का तीन चौथाई हिस्सा खेती को अपना रोजगार मानता है। हालांकि इसमें संदेह नहीं कि इन सालों में नकदी फसलों का उत्पादन बढ़ा है। अभिप्राय यह कि किसानों ने चावल, गेहूं के बजाय कपास और जूट जैसी फसलों के उत्पादन पर जोर दिया है। दूसरी आ॓र सब्जी की खेती भी अब पहले की तुलना में बड़े पैमाने पर की जाने लगी है। लेकिन यह भी सचाई है कि 1960 की हरित क्रांति का असर अब खत्म होने लगा है। लोगों को अब खेती में, खासकर अनाज उत्पादन में ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है। जहां तक सार्क देशों से पिछड़ने की बात है तो 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद स्थिति में बड़ी तेजी से बदलाव आया है। भारत में शहरीकरण, उच्च शिक्षा, बीपीआ॓, विज्ञान एवं तकनीक और प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया जाने लगा है। हम आर्थिक नजरिए से खुद को मजबूत बनाते गए। दूसरी आ॓र सालों तक अनाज के लिए हम पर निर्भर रहने वाले छोटे-छोटे सार्क देश खेती-किसानी पर ज्यादा जोर देने लगे। इस बीच हमारी कृषि नीतियां महज कागजी ही साबित हुई और हम पडा़ेसी मुल्कों से पिछड़ते गए। बहरहाल अब प्रश्न यह है कि भारत खाघान्न उत्पादन के मामले में क्या कारगर कदम उठाए? हमारी आबादी एक अरब से ज्यादा है और हम खाघ उत्पादन में पिछड़ते जाएंगे तो निस्संदेह एक दिन हमारी आबादी या तो भूखे सोएगी या दूसरे देश का अनाज खाएगी। इसलिए जरूरी इस बात की है कि हम पडा़ेसी मुल्क से कुछ सीखें और अपनी कृषि नीतियों पर फिर से विचार करें।

भ्रष्टाचार के विरूद्ध एक मुख्यमंत्री की जंग


बिहार इतिहास के एक नाजुक मोड़ पर खड़ा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में गत तीन वर्षों में फर्क ला दिया है। एक मीडिया समूह ने नीतीश को पालिटिशियन ऑफ द इयर चुना है। केंद्र सरकार ने बिहार सरकार को ई-गवर्नेंस के क्षेत्र में उत्कृष्टता के लिए स्वर्ण पदक दिया है। पूंजी निवेश के क्षेत्र में बेहतर उपलब्धि को देखते हुए एसोचेम ने कहा है कि बिहार अब बीमारू राज्यों की जमात से बाहर निकल रहा है। ये तीनों खबरें पिछले हफ्ते आई हैं। पर इससे अनेक जद (यू) कार्यकर्ता, नेता व प्रशासन के भ्रष्ट लोग कतई प्रभावित नहीं हैं। इसकी बानगी दिखी हाल ही में राजगीर के जनता दल (यू) चिंतन शिविर में जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने झल्ला कर कहा कि यदि आपको लूट की छूट चाहिए तो आप मेरी जगह दूसरा नेता चुन लीजिए। इससे पहले उन्होंने अपनी विकास यात्रा के दौरान प्राप्त कटु अनुभवों को देखते हुए यह ऐलान कर दिया कि वे अपनी ही सरकार के भ्रष्ट अफसरों और कर्मचारियों के खिलाफ चौतरफा जंग करेंगे। शायद एक दो हफ्तों में उस प्रस्तावित जंग का ठोस स्वरूप भी सामने आ जाएगा। यह अजीब बात है कि कोई मुख्यमंत्री अपने ही दल के अनेक कार्यकर्ताओं और अपनी ही सरकार के अधिकतर अफसरों व कर्मचारियों में मौजूद लोभ की प्रवृत्ति से इतना विचलित हो जाए। ऐसा लगता है कि यह एक आंतरिक जंग है। देखना है कि इसमें अंतत: कौन जीतता है।राजगीर के चिंतन श्वििर में कार्यकर्ताओं के सरकार विरोधी भाषणों ने नीतीश कुमार की चिंता बढ़ा दी। उन्हें अपने समापन भाषण में यह कहना पड़ा कि यदि कार्यकर्तागण इतने ही नाराज हैं तो वे अपना नया नेता चुन लें। पर यदि मुझे चुना है तो मैं अपने ही ढंग से काम करूंगा और किसी को लूट की छूट नहीं दूंगा। यानी जद(यू)कार्यकर्ताओं के एक बड़े हिस्से के दिलोदिमाग पर से अब भी पुरानी राजनीतिक कार्य संस्कृति का भूत नहीं उतर रहा है। कमोबेश यही स्थिति उस प्रशासनिक कार्यपालिका की है जिसका साथ लेकर नीतीश कुमार बिहार का कायापलट करना चाहते हैं। नीतीश कुमार ने हाल ही में चंपारण के गांवों में 5 रातें बिताने के बाद पटना में एक सार्वजनिक मंच से जनता से अपील कर दी कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ हल्ला बोल दें। सरजमीं की फर्स्ट हैंड जानकारी लेकर लौटे मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार में भ्रष्टाचार के खात्मे के बगैर विकास का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच सकता। हम जहां-तहां से साधन जुटा कर उसे इस गरीब राज्य के विकास कार्यों में खर्च करना चाहते हैं, पर भ्रष्टाचार में वे पैसे बीच में ही लूट लिए जाएं, यह हम बर्दाश्त नहीं कर सकते। उससे पहले वे खुद भी राज्य भर के सरकारी दफ्तरों में फैले भीषण भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ कारगर प्रशासनिक व कानूनी कार्रवाइयां करने जा रहे हैं, उनकी ताजा टिप्पणियों से यह संकेत मिला है। यह जानकारी तो उन्हें पहले से ही थी कि राज्य सरकार के अफसरों और कर्मचारियों में व्यापक भ्रष्टाचार के कारण सरकारी विकास व कल्याण योजनाओं का कम ही लाभ आम जनता तक पहुंच पा रहा है। इसीलिए उन्होंने कह रखा था कि वे अब भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार अफसरों और कर्मचारियों के मुकदमों की सुनवाई त्वरित अदालतों में कराने की व्यवस्था कराएंगे। साथ ही उन्होंने यह भी घोषणा कर रखी है कि घूसखोरी के आरोप में सरकारीकर्मियों को पकड़वाने वालों को 50 हजार रूपए तक का इनाम दिया जाएगा। यदि किसी भ्रष्ट अफसर के पकड़े जाने पर बड़ी मात्रा में काले धन का पता चलता है तो उस राशि का दो प्रतिशत इनाम के रूप में अलग से मिलेगा। उन्होंने अपने दल के कार्यकर्ताओं से पहले अपील की थी कि वे भ्रष्टों को पकड़वाने में सरकार की मदद करें। पर कोई कार्यकर्ता अब तक सामने नहीं आया। आज की राजनीति ही ऐसी हो चुकी है कि शायद ही किसी राजनीतिक कार्यकर्ता को घूसखोरों पर अब कोई गुस्सा आता है। इसी कारण मुख्यमंत्री को आम जनता से अपील करनी पड़ी। देखना यह है कि कहां से कितनी मदद मिलती है, पर संकेत है कि राज्य सरकार त्वरित अदालतों के गठन के लिए जल्दी ही पटना हाई कोर्ट से गुजारिश करेगी। अपराध से संबंधित मुकदमों की सुनवाई के लिए बिहार में गठित त्वरित अदालतों ने कमाल किया है। गत तीन साल में करीब 28 हजार अपराधियों को निचली अदालतों से सजाएं मिल चुकी हैं। नतीजतन अब बिहार में ‘जंगल राज’ नहीं है।आम लोगों ने उनकी विकास यात्रा के दौरान चंपारण में मुख्यमंत्री को बताया कि डकैतों का भय तो अब नहीं है, पर भ्रष्ट अफसर डकैत की तरह ही गरीब जनता को लूट रहे हैं। बिना घूस के सरकार का कोई काम नहीं हो रहा है। यह सुशासन नहीं बल्कि घूस–शासन है। पांचों दिन मुख्यमंत्री को यही सुनना पड़ा। नीतीश कुमार ने देखा कि उनके भ्रष्ट अफसर और कितने ताकतवर हो चुके हैं कि उन्हें किसी की कोई परवाह ही नहीं हैं ! मुख्यमंत्री तो भ्रष्टाचार पर अपराध की तरह ही काबू पाने की कोशिश करेंगे। उसमें उन्हें सफलता भी मिल सकती है जिस तरह अपराध के मोर्चे पर मिल चुकी है। पर सवाल यह है कि भ्रष्ट अफसर और कर्मचारी इतने निर्भीक कैसे हो चुके हैं कि उन्हें एक ऐसे मुख्यमंत्री की भी कोई परवाह नहीं है जो भीषण सरकारी भ्रष्टाचार का खात्मा चाहता है? बिहार के निगरानी दस्ते ने पिछले तीन साल में महा निदेशक स्तर के पुलिस अफसर और कलक्टर स्तर के आईएएस अफसर को भी भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार किया। इसके बावजूद सरकारी दफ्तरों में गत तीन साल में भ्रष्टाचार बढ़ा।बिहार सरकार में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है। इस भ्रष्टाचार ने तो सभी मानकों में बिहार को देश के राज्यों की सूची में पिछले वर्षों में सबसे निचले पायदान पर ठेल दिया था। सन् 1998 में तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास सचिव एनसी सक्सेना ने कहा था कि बिहार में नौकरशाही के सर्वोच्च शिखर तक चूंकि भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, इसलिए निचले तबके के अधिकारियों के मन में पैसा बनाने के खिलाफ भय समाप्त हो गया है।’ नीतीश कुमार के सत्ता में आने के बाद लगा था कि यह समाप्त हुआ भय वापस आ जाएगा। पर, ऐसा नहीं हुआ।ऐसा क्यों हुआ ? सवाल यह है कि ऐसे भ्रष्ट सरकारी मुलाजिमों को ताकत कहां से मिल रही है? दरअसल उन्हें ताकत राजनीतिक कार्यपालिका के एक बड़े हिस्से और अनेक जन प्रतिनिधियों के भ्रष्ट आचरण से मिल रही है। एमपी–विधायक फंड में जारी घूसखारी और कमीशनखोरी ने अफसरों और कर्मचारियों को और भी बेखौफ और निर्लज्ज बना दिया है। ऐसे जन प्रतिनिधियों की संख्या अब काफी कम है जो अपने फंड के बदले ठेकेदारों से कमीशन नहीं लेते। एमपी–विधायक फंड से हो रहे निर्माण कार्यों का कार्यान्वन और पर्यवेक्षण वही अफसर, ठेकेदार और इंजीनियर करते हैं जो राज्य के अन्य विकास कार्यों का काम करते हैं। वीरप्पा मोइली के नेतृत्व वाले प्रशासनिक सुधार आयोग ने यूं ही इस बात की सिफारिश नहीं की है कि एमपी–विधायक फंड को समाप्त कर दिया जाना चाहिए। हालांकि राजनीति और प्रशासन पर इसके कुप्रभाव को देखते हुए बिहार के तीनों प्रमुख नेता नीतीश कुमार लालू प्रसाद यादव और राम विलास समय-समय पर यह कह चुके हैं कि एमपी–विधायक फंड को समाप्त कर दिया जाना चाहिए।

कैसे कामयाब हो रोजगार गारंटी योजना


राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून बनाना और इस तरह हमारे गांवों में रोजगार के अधिकार को स्थापित करना यूपीए सरकार की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी गई है। इस कानून के अन्तर्गत बनी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना मूलत: अच्छी योजना है। यदि इस अधिनियम का क्रियान्वयन सही ढंग से हो और जो कानून में कहा गया है, वह ठीक-ठीक जमीनी स्तर पर दिखे, तो गरीबी दूर करने में इस योजना की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। पर्यावरण संरक्षण के कार्य व टिकाऊ विकास की बुनियाद तैयार करने वाले बहुत से कार्य इसके अन्तर्गत हो सकते हैं। अंतिम लक्ष्य तो यही है कि गांवों के टिकाऊ व आत्म–निर्भर विकास की बुनियाद तैयार हो तथा इस योजना का उपयोग इस लक्ष्य को ध्यान में रखकर करना चाहिए। टिकाऊ विकास के लिए, जल व मिट्टी संरक्षण तथा हरियाली बढ़ाने के कार्यों को करने के लिए अब इस योजना के कारण पहले से कहीं अधिक बजट उपलब्ध हो सकता है, यह बड़ी उपलब्धि होगी।पर, इन तमाम संभावनाओं का अपेक्षाकृत अच्छा उपयोग अभी देश के कमोबेश छोटे क्षेत्र में ही हो पा रहा है। देश के बड़े क्षेत्र में अभी उम्मीद के अनुकूल परिणाम रोजगार के अधिकार के इस कानून से नहीं मिल सके हैं, जिसे ‘नरेगा’ कहा जा रहा है। सवाल है कि जहां बेहतर परिणाम मिले हैं, वहां की स्थितियां कैसी थीं, ताकि इन स्थितियों को बड़े पैमाने पर उत्पन्न कर पूरे देश में इस योजना को सफल बनाया जा सके।‘नरेगा’ की सफलता के लिए बहुत महत्वपूर्ण शर्त यह है कि गांववासियों के व विशेषकर उनके कमजोर व जरूरतमंद वर्ग के संगठन मजबूत होने चाहिए। यदि ये संगठन मजबूत होंगे, तो जॉब कार्ड बनवाने, विधिसम्मत ढंग से रोजगार मांगने, रोजगार स्थल पर उचित मजदूरी व अन्य सुविधाएं सुनिश्चित करने व रोजगार न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता प्राप्त करने जैसे सभी कार्य ठीक से हो सकेंगे। दूसरी आ॓र, संगठन न होने पर अकेले कोई संवेदनहीन हो चली व्यवस्था में रोजगार की मांग के लिए देर तक संघर्ष नहीं कर सकता।दूसरी मुख्य बात यह है कि गांव व पंचायत की योजना बनाने का कार्य संतोषजनक ढंग से होना चाहिए। यदि पंचायत स्तर की अच्छी योजनाएं बनी हैं, तो आसानी से चुनाव हो सकता है कि किस कार्य को प्राथमिकता के आधार पर पहले करना है। अच्छी योजना बनाने का अभिप्राय यह है कि सभी लोगों की भागीदारी हो, महिलाओं व कमजोर आर्थिक–सामाजिक वर्ग विशेषकर दलित समुदायों पर विशेष ध्यान दिया जाए, टिकाऊ विकास व पर्यावरण संरक्षण की जरूरतों को भली–भांति समझकर कार्य किया जाए।इस योजना की तीसरी अहम शर्त है कि भ्रष्टाचार रोकने के लिए असरदार कदम उठाए जाएं। हालांकि ‘नरेगा’ में पारदर्शिता व जनता की जांच–निगरानी के महत्वपूर्ण प्रावधान हैं, पर जब ग्रामीण विकास कार्यों में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो, तो इन प्रावधानों की उपेक्षा होने लगती है। अत: भ्रष्टाचार करने वालों के विरूद्ध असरदार कार्यवाही करना व उन्हें न्यायोचित सजा दिलाना जरूरी है, ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लग सके।जब रोजगार गारंटी की बात की जाती है, तो ‘गारंटी’ पक्ष के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि रोजगार की व्यवस्था न होने पर बेरोजगारी भत्ता दिया जाए। ‘नरेगा’ में बेरोजगारी भत्ते की व्यवस्था है, पर इस बारे में कानून उतना मजबूत नहीं है, जितना होना चाहिए व क्रियान्वयन तो और भी कमजोर है। अत: बेरोजगारी भत्ते के मामले में कानून और क्रियान्वयन- दोनों को मजबूत किया जाए।आंकड़ों के अनुसार, योजना पर अभी तक जो खर्च हुआ है, वह जरूरतमंदों को एक सौ दिन का रोजगार दिलाने के लिए काफी कम है। वर्ष 2006–07 में ‘नरेगा’ पर 8,823 करोड़ रूपए खर्च हुए, 2007–08 में 15,857 करोड़ रूपए व 2008–09 में 17,076 करोड़ रूपए खर्च हुए। औसतन एक जिले पर 30 करोड़ रूपए का खर्च अभी बहुत कम है। जब यह ध्यान में रखें कि इसका महत्वपूर्ण हिस्सा भ्रष्टाचार में चला गया, तो यह उपलब्धि और भी कम हो जाती है। जब जमीनी स्तर पर जरूरतमंद लोग यह महसूस करते हैं कि उन्हें सौ दिन की अपेक्षा तीस–चालीस दिन ही काम मिला, पूरी मजदूरी नहीं मिल रही है या देर से मिल रही है, तो उन्हें बहुत निराशा होती है। इसके साथ पुरानी रोजगार योजनाएं रोकी गईं व कई सूखा प्रभावित क्षेत्रों में अलग से राहत कार्य शुरू नहीं किए गए, जिससे जरूरतमंदों को मिलने वाली राहत कम हो गई। पहले खाघ के बदले कार्य व सूखा राहत कार्यों से अनाज जरूरतमंद लोग तक नहीं पहुंचता था, वह अब नजर नहीं आ रहा है। इतना तो तय है कि ‘नरेगा’ के लक्ष्य हासिल करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।

Tuesday, February 3, 2009

भटकी रणनीति

भटकी रणनीति अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अफगानिस्तान-पाकिस्तान के लिए विशेष दूत नियुक्त कर शानदार काम किया है। ओबामा ने कहा है कि आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई में अफगानिस्तान और पाकिस्तान केंद्रीय मोर्चा है। मध्य-पूर्व के साथ-साथ यह इलाका अमेरिकी हितों के लिए महत्वपूर्ण है। ओबामा जब कहते हैं कि अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हालात बिगड़ते जा रहे हैं और एक दूसरे से संबद्ध दोनों देशों के लिए एक अनुकूल अमेरिकी कूटनीति की जरूरत है तो वह बिल्कुल सही होते हैं। वैसे अफगानिस्तान में सैन्य शक्ति बढ़ाने का उनका विचार गलत है। अफगानिस्तान में गर्मियों तक सैनिकों की संख्या करीब दोगुनी करके यह आंकड़ा 63 हजार पर लाने की योजना की मंशा तालिबान को सैन्य बल की ताकत से उखाड़ना नहीं है, बल्कि शक्ति प्रदर्शन के बल पर राजनीतिक समझौता करने की है। जो बुश प्रशासन ने इराक में किया वही ओबामा अफगानिस्तान में करना चाहते हैं। इराक में अमेरिका ने सुन्नी कबीलाई नेताओं और अन्य स्थानीय सरदारों को सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास किया था। अफगानिस्तान में और अधिक सैनिक भेजने की रणनीति अमेरिका को हार की ओर ले जाएगी। एक लाख से अधिक सोवियत सैनिक भी अफगानिस्तान को काबू नहीं कर पाए थे। असल मुद्दा सैनिकों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि सही रणनीति अपनाना है। रक्षा मंत्री राबर्ट गेट्स के वरदहस्त से अमेरिकी केंद्रीय कमान के कमांडर जनरल डेविड पेट्रायस तालिबान की प्रमुख शक्ति अफगान कमांडरों और कबीलाई नेताओं को समझा-बुझाकर रास्ते पर लाना चाहते हैं। जनरल पेट्रायस स्थानीय कबीलाई सरदारों और अन्य गुरिल्ला नेताओं के साथ संधि और मैत्री करना चाहते हैं। उन्होंने इराक में भी सैन्य शक्ति के बल पर ऐसा ही किया था। वार्ता को सफलता के अंजाम तक पहुंचाने के लिए अमेरिका को पहले तालिबान की शक्ति क्षीण करनी होगी। अफगानिस्तान के प्रत्येक प्रांत में स्थानीय सरदारों को तैनात करते समय उसे इराक में अपने अनुभव की किताब के पन्ने पलटने होंगे। यह कदम इस खतरे से आंखें फेरने वाला है कि ऐसे सरदार स्थानीय जनता को आतंकित कर सकते हैं। 2008 का वर्ष अमेरिकी सेनाओं के लिए सबसे घातक सिद्ध हुआ है। अगर तालिबान फिर से आक्रामक हो रहे हैं तो इसके दो प्राथमिक कारण हैं- तालिबान को पाकिस्तान से मिलने वाली सहायता और विदेशी दखल के खिलाफ पश्तूनियों का बढ़ता पलटवार अर्थात उनमें राष्ट्रवाद का जोर मारना। अमेरिकी शक्ति प्रदर्शन स्थानीय तालिबान कमांडरों और कबीलाई सरदारों में इतना खौफ पैदा नहीं कर पाएगा कि वे शांति संधि करने को मजबूर हो जाएं-खासतौर से तब जब अफगानिस्तान में अमेरिकी फौजों का साथ दे रहे कुछ देश युद्ध से आजिज आ चुके हैं। ऐसे समय जब अफगानिस्तान में युद्ध के लिए समर्थन घटता जा रहा है, ओबामा प्रशासन पर दबाव है कि वह जल्द कुछ परिणाम निकाले। वास्तव में इराक के समान अफगानिस्तान में सैनिकों में वृद्धि और घूसखोरी के अनुभव के आधार पर काबुल में सफलता की कामना करना भोलापन ही है। अफगानिस्तान का पर्वतीय इलाका, असंख्य कबीले, कबीलाई पंथिक आग्रह, अफीम का वैश्विक गढ़ और लंबे गृहयुद्ध का इतिहास इसे अन्य मुस्लिम देशों से अलग करता है। एक ऐसी जगह जहां विदेशी सेनाओं को नीचा दिखाने की लंबी परंपरा रही है, घूसखोरी से शांति नहीं खरीदी जा सकती। तब भी पेट्रायस बांटो और जीतो की साम्राज्यवादी कूटनीति का 21वीं सदी का संस्करण इस्तेमाल करना चाहते हैं। यह तय है कि पाकिस्तान पर अपनी निर्भरता बढ़ाने की पेट्रायस की योजना तालिबान को अपने दांत और पैने करने में सहायक सिद्ध होगी। रूस और मध्य एशियाई देशों के साथ रसद आपूर्ति करने के लिए रास्ता उपलब्ध कराने की नई संधियों से भी अमेरिका की पाकिस्तान पर निर्भरता अधिक नहीं घटेगी। ऐसे आसार हैं कि नई रणनीति को तर्कसंगत ठहराने के लिए अलकायदा और तालिबान में दिखावटी अंतर स्थापित किया जाएगा। इसके तहत अलकायदा को एक बुराई मानते हुए तालिबान के साथ समझौते की कोशिश की जाएगी। कटु सत्य यह है कि जिहाद के लिए बेचैन आत्माएं-अलकायदा, तालिबान और लश्करे-तैयबा एक-दूसरे के साथ इस तरह घुलमिल गए हैं कि इनको अलग-अलग करना संभव नहीं है। पाकिस्तान में इन्हें सुरक्षित पनाहगाह मिल रही है। एकमात्र अंतर यह है कि अलकायदा पर्वतीय गुफाओं के मुहाने से अभियान चलाता है, जबकि तालिबान और लश्करे-तैयबा पाकिस्तान में कुछ खुलकर कार्य करते हैं। इस प्रकार के किसी भी समूह के साथ संधि वैश्विक जिहाद संघ को मजबूती ही प्रदान करेगी। पहले इस नीति का समर्थन करने वाले उपराष्ट्रपति जो बिडेन की दलील है कि अमेरिका के लिए अफगानिस्तान को सुरक्षित रखना जरूरी है, क्योंकि अगर यह असफल हो गया तो पाकिस्तान में भी ऐसा ही होगा। वह दोहरी गलती कर रहे हैं। अफगानिस्तान में युद्ध को सात साल बीत चुके हैं। वह समय निकल चुका है जब सैन्य शक्ति में वृद्धि असरदार साबित होती। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि अमेरिका तब तक अफगानिस्तान में जीत हासिल नहीं कर पाएगा जब तक वह पाकिस्तान की सैन्य पनाहगाहों को ध्वस्त न कर दे और जब तक तालिबान को पाकिस्तान से मिलने वाली बुनियादी सहायता पर रोक न लगे। ओबामा के शपथ ग्रहण करने से तुरंत पहले ऐसा ही अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्टीफन हेडली ने कहा था-आप पाकिस्तान को साधने से पहले अफगानिस्तान को कभी नहीं साध पाएंगे। फिर भी, वाशिंगटन पाकिस्तान को असैन्य सहायता जारी रखने और जवाबदेही के साथ सैन्य सहायता देने की बात कर रहा है। वास्तविकता यह है कि अमेरिका इस स्थिति में है कि वह दीवालिया होने के कगार पर पहुंच चुके पाकिस्तान को 24 घंटे के भीतर घुटने टेकने को मजबूर कर दे। उसे पाकिस्तान को मिलने वाली तमाम सहायता रोकने और आतंक फैलाने वाले राष्ट्रों की सूची में डालने की धमकी देने भर की जरूरत है, जबकि अमेरिका इसका उलटा कर रहा है। वह पाकिस्तान के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि अमेरिका अशासित सीमा क्षेत्र के ऊपर मानवरहित विमान ड्रोन की कार्रवाई पाकिस्तानी सैन्य अधिकारियों की देखरेख में करने पर राजी हो गया है। साथ ही वह पाकिस्तान में फोन से होने वाली आतंकियों की बातचीत का रिकार्ड भी पाकिस्तान से साझा कर रहा है। अगर ओबामा प्रशासन इस संधि के माध्यम से अफगानिस्तान में हिंसा में कमी लाने में कामयाब हो भी जाता है तो भी पाकिस्तानी सेना की सहायता से तालिबान की संहारक शक्ति बरकरार रहेगी। इस प्रकार का सामरिक लाभ इस क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करेगा। अल्पकालीन सफलता की कामना से ओबामा प्रशासन दीर्घकालीन अमेरिकी नीतियों की कमजोरी का शिकार बन रहा है। वह छोटे लक्ष्यों की पूर्ति के लिए मित्रों की सुरक्षा की अनदेखी कर रहा है। जैसा कि मुंबई हमलों से जाहिर होता है, अफगानिस्तान-पाकिस्तान पट्टी में अमेरिका की विफल नीतियों का सबसे अधिक खामियाजा भारत को ही भुगतना पड़ा है।

Monday, February 2, 2009

किस मुद्दे पर लड़े जाएंगे आम चुनाव


आम चुनावों में अब कुछ ही महीने शेष रह गए हैं। इसे देखते हुए देश में यह बहस जोरों पर है कि आने वाले लोकसभा चुनावों में मतदाताओं को रिक्षाने के लिए पार्टियां किन मुद्दों की मदद लेंगी।


क्या इस बार के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के लिए आतंकवाद का मुद्दा महत्वपूर्ण होगा या बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी या फिर आर्थिक सुधार और उदारीकरण की बात? पिछले दो दशकों में, भारतीय राजनीति में कई परिर्वतन हुए हैं। क्षेत्रीय पार्टियों का राष्ट्रीय राजनीति में प्रभाव बढ़ा है और राष्ट्रीय पार्टियों का जनाधार घटा है। आज किसी भी एक पार्टी के लिए राष्ट्रीय चुनावों में बहुमत हासिल करना मुश्किल हो गया है। वर्ष 1991 में हुए आम चुनावों में जहां क्षेत्रीय पार्टियों ने कुल मिलाकर लोकसभा की 55 सीटें जीती थीं और लगभग 24 प्रतिशत वोट प्राप्त किए थे, वहीं 2004 के लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों ने कुल 174 सीटों पर विजय हासिल की और लगभग एक तिहाई प्रतिशत मत प्राप्त किए। इन चुनावों में राष्ट्रीय पार्टियों का वोट प्रतिशत 80 से घटकर 63 ही रह गया। इस तरह देश में मिलीजुली सरकारों का दौर शुरू हुआ।पार्टियों और सरकारों के बदलते स्वरूप के साथ-साथ चुनावी राजनीति और चुनावी रणनीति के स्वरूप में भी काफी परिवर्तन आया। सत्तर और अस्सी के दशक में होनेवाले लोकसभा चुनावों में अक्सर राष्ट्रीय मुद्दे प्रभावी होते थे और राज्यों के या स्थानीय मुद्दे बहुत कम उठाए जाते थे। मिसाल के तौर पर 1971 के लोकसभा चुनाव में 'गरीबी हटाओ', 1977 के चुनाव में इंदिरा हटाओ, 1980 के चुनाव में सरकार की स्थिरता, 1984 के चुनाव में राष्ट्र स्तर पर चली सहानुभूति लहर और 1989 के आम चुनावों में 'बोफोर्स और भ्रष्टाचार' राष्ट्रव्यापी मुद्दे बने थे। पर अब ऐसे राष्ट्रीय मुद्दे गौण हो गए हैं। पार्टियां अपने घोषणापत्र में भले ही बड़ी-बड़ी बातों का जिक्र करें, परंतु मतदाताओं पर जिसका सबसे ज्यादा असर होता है, वह है उनकी रोजमर्रा की जिंदगी की समस्याएं; जैसे बिजली, सड़क, पानी और रोजगार। उल्लेखनीय यह है कि अब मुद्दों को लेकर लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय चुनावों के बीच का अंतर लगभग खत्म हो गया है। किसी भी चुनाव में मतदाताओं के वोट देने के निर्णय पर सबसे ज्यादा असर उन समस्याओं का पड़ता है, जिनका उन्हें रोजाना सामना करना पड़ता है। अगर एक चुनावी क्षेत्र में बिगड़ती कानून व्यवस्था मतदाताओं के बीच अहम मुद्दा है, तो यह संभव है कि उसके बगल के चुनावी क्षेत्र में सड़क या बिजली की समस्या मतदाताओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा हो। जो उम्मीदवार इन समस्याओं को सुलझाने का ज्यादा आश्वासन देता है या जिस उम्मीदवार ने इन समस्याओं को सुलझाने का प्रयास दूसरों की तुलना में ज्यादा किया हो, मतदाताओं का रुझान पार्टी के बजाय ऐसे उम्मीदवार की तरफ ज्यादा होता है। सर्वेक्षणों से भी यह बात साफ सामने आई है कि मतदाताओं के वोट देने का निर्णय उम्मीदवार की जात-बिरादरी, धर्म या 'उसकी पार्टी की बजाय' उसकी छवि पर ज्यादा निर्भर करता है। स्पष्ट है कि स्थानीय मुद्दों को अहमियत देने वाले उम्मीदवार मतदाताओं के बीच ज्यादा लोकप्रिय होते हैं। ऐसे बदलते माहौल में राष्ट्रीय मुद्दों का महत्व घट गया है, चाहे वह धर्मनिरपेक्षता का मुद्दा हो, आतंकवाद का मुद्दा हो या फिर आर्थिक उदारीकरण की नीति का मुद्दा ही क्यों न हो? करीब दो महीने पहले 26 नवंबर को मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों और फिर लोगों के आक्रोश को देखकर ऐसा लगा था कि आतंकवाद चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बनकर छाएगा। परंतु मुंबई की घटना के बाद पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों से प्रतीत होता है कि आतंकी हमले से आम लोगों में भले ही सरकार के प्रति नाराजगी थी, पर आतंकवाद के मुद्दे ने मतदाताओं के वोट देने के निर्णय पर शायद ही कोई असर डाला हो। सेंटर फॉर द स्टडीज़ डिवेलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) द्वारा विधानसभा चुनावों में किए गए सर्वेक्षणों से यह बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई है कि आतंकवाद विधानसभा चुनावों में चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया। इसी तरह सवाल पैदा होता है कि क्या महंगाई और आर्थिक उदारीकरण आने वाले लोकसभा चुनावों में अहम मुद्दे बनकर उभर सकते हैं? बढ़ती महंगाई असल में कई चीजों का मिला-जुला प्रभाव है, जिसमें आर्थिक उदारीकरण की नीति एक कारक है। शहरों में रहने वाले, पढ़ेलिखे नौकरीपेशा लोगों को देख कर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि चूंकि आर्थिक उदारीकरण की नीति से उन लोगों की माली हालत में सुधार आया है, इसलिए ये मध्यम वर्गीय मतदाता उदारीकरण की नीति के पक्षधर होंगे और चुनावों में उदारीकरण का समर्थन करने वाली पार्टी का पक्ष लेंगे। परंतु इन लोगों की बात करते वक्त गांवों में रहने वाले और पिछड़े व कम पढ़ेलिखे उन 70 फीसदी मतदाताओं को कैसे भूल सकते हैं, जिन्हें आर्थिक नीतियों में होनेवाले फेरबदलों की कम समझ है। इसलिए इसकी गुंजाइश कम ही लगती है कि आर्थिक उदारीकरण की नीति आम चुनाव में एक राष्ट्रीय मुद्दा बन कर उभरेगी। सर्वेक्षणों से यह स्पष्ट है कि आज भी आम मतदाताओं को आर्थिक उदारीकरण की नीति और उसके असर की जानकारी बहुत कम है। 1996 में जब उदारीकरण नीति को देश में अपनाए हुए पांच साल पूरे हुए थे, तब सिर्फ 19 प्रतिशत मतदाताओं को ही इसकी जानकारी थी। बाद में उम्मीद थी कि इस नीति के बारे में जागरूकता बढ़ेगी, परंतु वैसा कुछ नहीं हुआ। 2007 में किए गए सर्वेक्षण के मुताबिक आज भी सिर्फ 28 प्रतिशत मतदाताओं को ही आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के बारे में कुछ पता है। देश के दो-तिहाई से भी ज्यादा मतदाताओं ने इसके बारे में कुछ भी नहीं सुना था। सर्वेक्षणों के आंकड़ों और मतदाताओं के अब तक के रुझानों से स्पष्ट होता है कि फिलहाल ऐसा कोई राष्ट्रीय मुद्दा नहीं है, जिसे पार्टियां आम चुनावों में भुना सकें और जिसके आधार पर अपने पक्ष में ध्रुवीकरण कर सकें। ज्यादातर दल स्थानीय मुद्दों के सहारे ही अपनी चुनावी वैतरणी पार लगाने की कोशिश कर सकते हैं।

सुरक्षा को औरत का हक नहीं माना

साल के शुरू में ही दिल्ली से सटा नोएडा फिर सुर्खियों में आ गया है। पिछले साल हुए निठारी कांड और आरुषि कांड के बाद अब इस वहशी सामूहिक बलात्कार की घटना के कारण यह शहर फिर से चर्चा में है। आम नागरिक इस घटना से स्तब्ध है। ऐसे हालात में महिलाएं कैसे सुरक्षित रह पाएंगी? इस घटना की तुलना पत्रकार सौम्या विश्वनाथन के साथ हुए हादसे से करते हुए कोई यह भी नहीं कह सकता कि उस लड़की ने कोई दुस्साहस किया था। सौम्या की हत्या के बाद दिल्ली की मुख्यमंत्री ने कहा था कि आधी रात को अकेले घर से बाहर जाकर उसने दुस्साहस किया। पर नोएडा में यह छात्रा तो अपने एक साथी के साथ कार में शॉपिंग मॉल से वापस लौट रही थी। जब महिलाएं कार में सुरक्षित नहीं हैं, तो पैदल चलने वाली महिलाएं कितना भय अपने साथ लेकर चलती होंगी- इसका अनुमान लगाया जा सकता है। आमतौर पर हमारे समाज में जब इस तरह की गंभीर घटनाएं सामने आती हैं, तब प्रशासन, मीडिया तथा आम जन भयानक उथलपुथल से घिर जाते हैं और परेशान नजर आते हैं। लेकिन ऐसी घटनाओं पर उठे बवाल के शांत होने के बाद इनके स्थाई समाधान को लेकर कोई अधिक चिंता नहीं देखी जाती है। अगर ऐसा होता, तो इनसे निपटने के ठोस उपाय भी सोचे गए होते। अपने देश में बलात्कार के 49 हजार मामले अदालतों में लंबित पड़े हैं। बलात्कार के जितने केस दर्ज होते हैं, उनमें से 25 प्रतिशत अपराधियों को ही सजा मिल पाती है। पिछले साल इस संबंध में गृह मंत्रालय ने जो आंकड़े पेश किए थे, वे इसके सबूत हैं कि स्थिति कितनी शोचनीय है। मंत्रालय के अनुसार देश में हर दिन बलात्कार के 57 मामले दर्ज होते हैं, यानी यहां हर 25 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार होता है। इसके अलावा प्रति मिनट 106 महिलाएं छेड़छाड़ की शिकार होती हैं। ऐसे समय में, जबकि सरकार लगातार महिलाओं के सशक्तीकरण की बात कह रही है, यौन हिंसा के अलावा स्त्री विरोधी दूसरे तरह की हिंसाओं के ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं और स्थिति की गंभीरता को बताते हैं। बहरहाल, ये आंकड़े तो समस्या का नमूना भर हैं। सभी जानते हैं कि वास्तविक अपराधों की संख्या, दर्ज केसों के मुकाबले कई गुना अधिक हो सकती है। वजह यह है कि हमारे समाज में ऐसे मामले औरत की इज्जत के साथ जोडे़ जाते हैं और स्त्री की प्रतिष्ठा को बचाने के नाम पर ऐसा कुछ हो जाए तो उस पर पर्दा डालने की ही कोशिश की जाती है। उनके खुलासे से भरसक बचा जाता है। यौन हिंसा की ज्यादातर घटनाओं को इसीलिए दबाने की हर मुमकिन कोशिश होती है। दूसरे, हमारे देश में कानूनी प्रक्रियाएं इतनी जटिल हैं कि साधारण इंसान तो उसका सामना करने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता है। इसके बावजूद यदि सिर्फ दर्ज मामलों पर ही गौर किया जाए, तो स्थिति की भयावहता का अंदाजा लगा सकते हैं। यह मानना गलत होगा कि हर अपराधी दिमागी तौर पर बीमार होता है। कुछ अपराधी जरूर ऐसी प्रवृत्ति के हो सकते हैं, लेकिन ऐसे अपराधों का ज्यादा बड़ा कारण हमारे समाज में व्याप्त स्त्रीदोही मानसिकता है। समाज की हर इकाई के हर संस्थान में, चाहे वह परिवार हो, शिक्षण संस्थान हो या कोई भी कार्यस्थल, स्त्री कहीं भी भोग लिए जाने या इस्तेमाल की वस्तु समझे जाने से बच नहीं पाती है। ऐसा सिर्फ अपराधी प्रवृत्ति के लोग ही नहीं सोचते, बल्कि दूसरे सभ्य दिखने वाले अन्य तमाम लोगों की सोच में भी उस मानसिकता के दर्शन होते हैं। बलात्कार औरत को डराने का सबसे बड़ा हथियार है। जब जमीन संपत्ति का मसला हो, धर्म का या सांप्रदायिक दंगे का मसला हो या जब युद्ध की स्थिति हो, हर ऐसी स्थिति में महिला यौन हिंसा की शिकार होती है। असल में, नोएडा की घटना हमारे समाज की अंदरूनी बीमारी का ही प्रतिबिंबन है। हजारों महिलाएं हर साल ऐसिड अटैक की शिकार हो रही हैं, क्योंकि वे कुछ पुरुषों की इच्छा के सामने समर्पण करने से इनकार कर देती हैं। उड़ीसा में जब एक नन के साथ बलात्कार हुआ, तो उड़ीसा के कुछ अखबारों ने इस घटना पर ही संदेह जताया। उसी तरह विदेशी टूरिस्ट स्कारलेट के बलात्कार तथा उसकी हत्या के बाद उसके चरित्र को ही लांछित करने का प्रयास किया गया। गोवा के 385 व्यक्तियों ने अपने नाम-पते के साथ अखबार में विज्ञापन दिया कि वह तो असल में एक चरित्रहीन लड़की थी। यह उन सभी 385 पुरुषों की मानसिकता का प्रतिबिंब था, जो यह मान कर चलता है कि उसे किसी भी स्त्री को चरित्र का सर्टिफिकट देने का जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त है। और यदि कोई चरित्रहीन है तो उसके साथ बलात्कार किया जा सकता है, हत्या की जा सकती है - वह कोई बड़ी बात नहीं है। कानून में संशोधन के बावजूद भारतीय जनमानस यह बात स्वीकार नहीं कर पाया है कि बलात्कार के अपराध का पीडि़ता के चरित्र से कोई लेनादेना नहीं होता। यदि महिला के साथ किसी ने यौनाचार किया है, तो इससे अपराधी का दोष कम नहीं हो जाता कि महिला के चरित्र पर कोई दाग था। जाहिर है कि ये बातें अपराध को छिपाने या अपराधी को बचाने के लिए उठाई जाती हैं। दरअसल, हमारे देश में महिलाओं की सुरक्षा का मामला अभी तक उनके अधिकार के तौर पर स्थापित नहीं हो पाया है। उनके साथ होने वाले अपराधों को नैतिक बुराई के रूप में लिया जाता है। मसलन, समाज का बड़ा तबका एक बलात्कारी के बारे में इस तरह सोचता है कि कुछ लोग कितने बुरे और अनैतिक हैं कि एक बेचारी स्त्री की आबरू से खेलते हैं या उसका शीलभंग कर डालते हैं। इसी तरह यौन हिंसा या बलात्कार की जगह 'दुष्कर्म' शब्द का प्रयोग अपराध की तीव्रता को कम कर देता है। महिलाओं के साथ होने वाली छेड़छाड़ को तो गंभीर अपराध की श्रेणी में ही नहीं रखा जाता। यदि सुरक्षित होना महिलाओं का हक माना जाता, तो प्रशासन और पूरे समाज को यह जिम्मेदारी उठानी पड़ती और उनकी सुरक्षा के उपाय करने पड़ते।

Saturday, January 31, 2009

ओबामा और मुस्लिम जगत


ओबामा और मुस्लिम जगत यद्यपि जार्ज बुश 11 सितंबर, 2001 से पद छोड़ने की तिथि 20 जनवरी, 2009 तक आतंक के खिलाफ युद्धरत रहे, फिर भी वह यह परिभाषित करने में हिचकते रहे कि युद्ध में उनका शत्रु कौन है? आतंकवाद ऐसी रणनीति है जिस पर वे लोग चल रहे हैं जिन्होंने अन्य सभी सभ्यताओं के खिलाफ युद्ध की उद्घोषणा कर रखी है। अमेरिका के नए राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने शपथ ग्रहण संबोधन में ही शत्रुओं की पहचान करने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई। ये तत्व इस्लाम के कट्टर स्वरूप मेंहैं। उन्होंने इन तत्वों को यह बता दिया कि वे इतिहास के गलत पाले में खड़े हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका उन्हें नहीं छोड़ेगा और परास्त करके ही दम लेगा। उन्होंने मुस्लिम समुदाय को आश्वस्त भी किया कि उनके साथ अमेरिका के संबंध परस्पर मान और पारस्परिक हितों के आधार पर कायम होंगे। इस बेबाक घोषणा के पश्चात ओबामा ने 26 जनवरी को दुबई के अल-अरबिया टीवी को इंटरव्यू में कहा, मेरे खुद के परिवार में मुस्लिम सदस्य हैं। मैं मुस्लिम देशों में रहा हूं..मेरा काम मुस्लिम विश्व को यह बताना है कि अमेरिका उनका शत्रु नहीं है। उन्होंने कहा कि वह अपने कार्यकाल के शुरुआती सौ दिनों के भीतर ही किसी मुस्लिम देश की राजधानी से मुस्लिम समुदाय को संबोधित करेंगे। उन्होंने अल कायदा के नेताओं-ओसामा बिन लादेन और अल जवाहिरी की विचारधारा को दीवालिया बताया। ओबामा यह वायदा भी करते हैं कि समाधान निकालने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने की अपनी वचनबद्धताओं को पूरा करेंगे। मुस्लिम समुदाय की बात सुनेंगे और अपनी बात उनके सामने रखेंगे। अपने कुछ पूर्ववर्तियों के विपरीत वह अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही फलस्तीन समस्या का हल निकालने का इरादा रखते हैं। इसलिए उन्होंने अपने विशेष दूत जार्ज मिशेल को इस अभियान पर लगा दिया है। उन्होंने ईरान के साथ वार्ता की पेशकश भी की, बशर्ते पहले वह जड़ता छोड़े। ओबामा ने कहा है, दुनियाभर में ऐसे नेताओं जो झगड़े का बीज बोना चाहते हैं या फिर अपनी तमाम परेशानियों का ठीकरा पश्चिम के सिर फोड़ना चाहते हैं, को यह जानना चाहिए कि जनता आपका आकलन आपके द्वारा किए जाने वाले निर्माण से करेगी, न कि विनाश से। ओबामा यह स्पष्ट कर रहे हैं कि उग्रवादी संगठनों के हिंसा फैलाने के कारण वह पूरे पंथ को ही हिंसा का आरोपी नहीं ठहरा सकते। इसके कुछ नेता और संगठन ही जिम्मेदार हैं। उन्होंने यह उल्लेख करना भी जरूरी समझा कि अमेरिका कभी साम्राज्यवादी नहीं रहा, किंतु इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पिछले साठ वर्षो में शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने इस्लामिक विश्व और खासतौर से मुस्लिम देशों के शासकों को नास्तिक साम्यवाद के खिलाफ इस्तेमाल किया। अपनी आबादी के बीच लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों का उभार रोकने के लिए मुस्लिम शासक तेजी से अमेरिका की तरफ झुक गए। सस्ते तेल के रूप में अमेरिका ने भी इस स्थिति का फायदा उठाया। इस्लामिक राष्ट्रों के शासकों के लिए यह सुविधाजनक था कि तमाम तरह के परिवर्तन के विरोध के लिए पंथ का इस्तेमाल करें। अन्य किसी भी पंथ की तुलना में इस्लामिक धर्मगुरुओं का वर्ग अतीत से विरासत में मिली परंपराओं पर अधिक भरोसा करता है। इस रूप में अमेरिकी और मुस्लिम जनता के बजाय शासकों के बीच संबंध पारस्परिक हितों पर ही टिके थे। ये पारस्परिक मूल्यों पर आधारित नहीं थे। दोनों पक्ष बड़ी धूर्तता से एक-दूसरे का इस्तेमाल कर रहे थे। ओबामा इसे बदलने का प्रयास कर रहे हैं। उन्हें सत्ता भी परिवर्तन की जरूरत पर बल देने पर ही मिली है। ऊर्जा के नए स्त्रोतों के विकास के संदर्भ में संकेत मिलता है कि ओबामा तेल उत्पादक इस्लामिक देशों पर निर्भरता कम करने का प्रयास करेंगे। ओबामा इस्लामिक विश्व को संबोधित करते हुए कहते हैं कि उनके मुस्लिम रिश्तेदार हैं, वह ऐसे देश के राष्ट्रपति हैं जिसमें मुस्लिम आबादी है। वह बदलाव के ऐसे योद्धा हैं जो अमेरिका और विश्व के अन्य भागों में आम आदमी की दशा को सुधारना चाहता है, जो जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंतित है और तेल पर निर्भरता कम करना चाहता है। इस प्रकार वह शीत युद्ध काल सरीखे रूढ़ीवादी अमेरिकी नजर नहीं आते। बुश की तरह उनका जोर लोकतंत्र पर नहीं है। वह पूछ रहे हैं कि इस्लामिक देशों की नीतियां उनकी आने वाली पीढि़यों को एक बेहतर भविष्य देंगी या नहीं? उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह इजरायल को अमेरिका के सहयोगी के रूप में मानने को वचनबद्ध हैं। उनके विचार में इजरायल को अपना अस्तित्व बचाने और राकेट के हमलों से खुद की रक्षा करने का अधिकार है। दूसरे शब्दों में उनके प्रति ओबामा के मन में कोई सहानुभूति नहीं है जो आतंकवादी तरीकों से अरब-इजरायल समस्या का समाधान निकालना और इजरायल को बर्बाद करना चाहते हैं। वह मुस्लिम समुदाय से परस्पर मान और हितों के आधार पर संबंध विकसित करने की बात करते हुए भी अमेरिकी कार्यप्रणाली और नीतियों पर खेद नहीं जताते। अल कायदा ने खुद को अमेरिका का शत्रु घोषित कर रखा है और ओबामा ने अल कायदा के खात्मे का संकल्प लिया है। इसीलिए अमेरिका और नाटो अफगानिस्तान में टिकेंगे और अल कायदा का शिकार करेंगे। बहुत से लोगों की दलील है कि तालिबान अमेरिका का शत्रु नहीं है, इसलिए उसे तालिबान और अल कायदा के बीच भेद रखते हुए तालिबान से संधि कर लेनी चाहिए। जब तालिबान लड़कियों के स्कूल आग के हवाले कर देता है और अपनी खुद की गढ़ी हुई शरीयत जबरन थोपना चाहता है तो वह आस्था के नाम पर आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा होता है। उग्रवादी पंथ के इस खतरे का सबसे अधिक सामना विश्व के दूसरे सबसे बड़े मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान को करना पड़ रहा है। अब यह पाकिस्तान पर निर्भर है कि उसे तालिबानी इस्लामिक उग्रवाद से खुद को बचाने के लिए अमेरिकी मदद चाहिए या नहीं? ओबामा के इसी सवाल में पाकिस्तान फंस गया है।

कांग्रेस का चुनावी दाव

कांग्रेस का चुनावी दांव केंद्र में गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रही कांग्रेस ने अगले आम चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर किसी दल के साथ गठजोड़ करने के स्थान पर अकेले मैदान में उतरने का जो निर्णय लिया वह उसका एक राजनीतिक दांव हो सकता है, लेकिन यदि वह यह सोच रही है कि उसे अपने दम पर सरकार गठित करने लायक बहुमत मिल जाएगा तो उसे निराश होना पड़ सकता है। कांग्रेस का यह निर्णय यह भी बताता है कि अधिकांश क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ कांग्रेस भी गठबंधन की राजनीति को अपनी सुविधा के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहती है। 2004 के पिछले आम चुनाव में भी कांग्रेस छिटपुट राज्यों में गठजोड़ को छोड़कर अपने बलबूते मैदान में उतरी थी, पर तब भी उसने यह उम्मीद शायद ही की हो कि उसे सत्ता में दावेदारी करने लायक सीटें मिल सकेंगी। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद कांग्रेस ने भाजपा से अधिक सीटें जरूर हासिल कीं, लेकिन बहुमत से वह दूर ही रही। तब उसने कथित पंथनिरपेक्ष दलों को अपने साथ लाकर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का निर्माण किया और पांच साल तक सत्ता में रहे इस समूह का नेतृत्व किया। ऐसा लगता है कि कांग्रेस हाल की कुछ राजनीतिक घटनाओं को देखते हुए अपनी चुनावी रणनीति को नए सिरे से निर्धारित कर रही है। वास्तव में कांग्रेस को आम चुनाव के संदर्भ में दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। एक तो संप्रग के कुछ घटक दल आम चुनाव के बाद सरकार गठन के लिए अपने विकल्प खुले रखना चाहते हैं-विशेषकर प्रधानमंत्री चयन के मामले में और दूसरे, स्वयं कांग्रेस नेतृत्व के संदर्भ में यह तय करने में कठिनाई का अनुभव कर रही है कि किसे आगे कर आम चुनाव में उतरा जाए? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अस्वस्थता के कारण कांग्रेस की यह परेशानी बढ़ी ही है। यह संभव है कि स्वास्थ्य कारणों से मनमोहन सिंह अगली सरकार में अपनी दावेदारी न पेश कर सकें। संप्रग के घटक दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार की प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी को भले ही उनकी महत्वाकांक्षा माना जाए, लेकिन गठबंधन की राजनीति में जिस तरह सिद्धांतों और आदर्शों को कोई भी राजनीतिक दल महत्व देने के लिए तैयार नहीं उससे कांग्रेस का शरद पवार की ऐसी किसी मुहिम से असहज होना स्वाभाविक है। वैसे तो कांग्रेस ने यह संकेत दिया है कि वह कुछ राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ चुनावी तालमेल कर सकती है, लेकिन उसने जिस प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर किसी दल के साथ गठबंधन न करने का फैसला किया उससे उन क्षेत्रीय दलों के मंसूबे अधूरे रह सकते हैं जो अपनी उपस्थिति दूसरे राज्यों में दर्ज कराना चाहते हैं। अनेक ऐसे क्षेत्रीय दल हैं जो किसी राज्य विशेष में तो अपना व्यापक जनाधार रखते हैं, लेकिन उससे बाहर उनकी कहीं कोई उपस्थिति नहीं। संप्रग में शामिल या उसके साथ नजदीकी रखने वाले ऐसे क्षेत्रीय दलों को निश्चित ही कांग्रेस की यह घोषणा रास नहीं आने वाली कि वह चुनाव के पूर्व कोई राष्ट्रीय गठजोड़ बनाने के लिए तैयार नहीं। इस संदर्भ में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल का जिक्र किया जा सकता है, जो अपने जनाधार वाले राज्यों-उत्तर प्रदेश और बिहार के बाहर कोई विशेष सफलता नहीं हासिल कर पा रहे हैं। सिर्फ यही दोनों दल ही नहीं, बल्कि लगभग सभी क्षेत्रीय दल अपने को राष्ट्रीय दल के रूप में पेश करने के लिए कई राज्यों में प्रत्याशी उतारते हैं, लेकिन उन्हें मनमाफिक सफलता नहीं मिलती। अभी यह पूरी तौर पर स्पष्ट नहीं कि क्या कांग्रेस उसी दौर में फिर से लौट रही है जब वह किसी के साथ गठबंधन करने के लिए तैयार नहींथी? आखिर यह एक सच्चाई है कि कांग्रेस एक लंबे अर्से तक गठबंधन की राजनीति के यथार्थ को स्वीकार नहीं कर सकी। यह राष्ट्रीय स्तर पर उसकी शक्ति सिमटते जाने का ही परिणाम है कि उसने गठबंधन की राजनीति को न केवल गले लगाया, बल्कि अनेक क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर केंद्र में सरकार भी गठित की। कांग्रेस भले ही यह महसूस करे कि चुनाव में अकेले उतरने का उसका निर्णय क्षेत्रीय दलों को यह नसीहत है कि वे देश पर राज करने का सपना न देखें, लेकिन उसे इस फैसले की कीमत भी चुकानी पड़ सकती है। कांग्रेस ने यदि यह निर्णय अपनी मजबूती वाले राज्यों में सीटों के बंटवारे से बचने के लिए किया है तो उसे यह भी देखना होगा कि उन राज्यों में उसे अपेक्षित कामयाबी कैसे मिलेगी जहां उसकी स्थिति कमजोर है? चुनाव पूर्व गठबंधन से दूर रहने के कांग्रेस के दृष्टिकोण से संप्रग के घटक दलों का इसलिए भी बेचैन होना स्वाभाविक है, क्योंकि गठबंधन का कोई साझा घोषणा पत्र न होने के कारण कांग्रेस मौजूदा सरकार के सभी बेहतर कार्यों का श्रेय स्वयं लेने की कोशिश कर सकती है। आम जनता के लिए यह निर्णय करना कठिन होगा कि जो अच्छे कार्य हुए हैं उनके पीछे कांग्रेस का योगदान है या संप्रग का? वैसे तो राजनीतिक तौर पर कांग्रेस के अपने भविष्य के लिए यह उचित हो सकता है कि वह अकेले चुनावी मैदान में उतरे, लेकिन इससे गठबंधन राजनीति के मौजूदा दौर में उन दलों को बढ़ावा ही मिलेगा जो चुनाव बाद सत्ता पाने के लिए गठजोड़ करने की फिराक में रहते हैं। यदि कांग्रेस इस बार भी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तो वह उन्हीं दलों के साथ गठबंधन की अपेक्षा करेगी जिनके साथ वह चुनाव पूर्व गठबंधन करना उचित नहीं समझ रही है। चुनाव बाद गठबंधन की आड़ में जनादेश का जिस प्रकार निरादर किया जाता है उसमें यह संभव है कि वे क्षेत्रीय दल भी साझा सरकार गठित करने के लिए कांग्रेस को समर्थन दें जो चुनावों में उसके खिलाफ जीत हासिल कर आए हों। यह कुछ और नहीं, मतदाताओं के साथ खिलवाड़ ही है कि राजनीतिक दल उनसे जिस दल की नीतियों और कार्यों के खिलाफ समर्थन मांगते हैं, परिणाम आने के बाद उसी के साथ सरकार बनाने में जरा भी नहीं हिचकिचाते। विडंबना यह है कि गठबंधन की राजनीति में इस प्रकार की धोखाधड़ी से कोई भी राजनीतिक दल दूर नहीं। अकेले चुनाव में उतरने की कांग्रेस की घोषणा के प्रति संप्रग के घटक दलों की प्रतिक्रिया कुछ भी क्यों न हो, लेकिन इसमें अधिक संदेह नहीं कि चुनाव के बाद क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। इस संदर्भ में वामपंथी दलों के रुख पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा, जिन्होंने लगभग साढ़े चार साल तक संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन दिया। इसके अतिरिक्त अन्नाद्रमुक और तेलगुदेशम पार्टी जैसी कुछ अन्य क्षेत्रीय शक्तियां भी हैं, जिन्होंने संप्रग अथवा राजग में किसी के प्रति अपना झुकाव स्पष्ट तौर पर प्रदर्शित नहीं किया है। जैसी कि वर्तमान राजनीतिक स्थितियां हैं, कांग्रेस और भाजपा की बात तो दूर, उनके नेतृत्व वाले संप्रग और राजग के लिए भी यह दावा करना कठिन है कि उन्हें सरकार गठित करने लायक बहुमत मिल जाएगा। संभवत: यही कारण है कि राजग अपना आकार बढ़ाने की कोशिश में है। गठबंधन की राजनीति में कुछ भी अनुचित नहीं, लेकिन यह जरूरी है कि राजनीतिक दलों के बीच तालमेल किन्हीं सिद्धांतों के आधार पर हो। यदि राजनीतिक दल गठबंधन के नाम पर सिद्धांतहीन तालमेल अर्थात अवसरवादिता को बढ़ावा देंगे तो इससे न केवल राजनीति के प्रति आम जनता की अरुचि बढ़ेगी, बल्कि वे आधार भी कमजोर होंगे जिन पर हमारा लोकतंत्र खड़ा है।

Friday, January 30, 2009

तैयार हो रही है राहुल की राह....................


एक बार फिर राहुल गांधी को पीएम बनाए जाने का मुद्दा गरमाया हुआ है। विदेश मंत्री प्रणव मुखर्
जी ने कहा है कि अब वह दिन दूर नहीं, जब राहुल देश का नेतृत्व संभालेंगे। दिग्विजय सिंह भी ऐसी राय व्यक्त कर चुके हैं। पिछले साल अर्जुन सिंह ने जब यह मुद्दा उठाया था, तो इसका जोरदार तरीके से खंडन कर दिया गया था। खंडन तो इस बार भी किया जा रहा है, मगर उसमें वैसी तत्परता और स्पष्टता है। कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद समेत दूसरे नेता बात को गोलमोल कर दे रहे हैं। वे इस बात को अब इस तरह कह रहे हैं कि राहुल प्रधानमंत्री बन सकते हैं, उनमें इसकी पूरी क्षमता है, लेकिन कब बनेंगे यह नहीं कहा जा सकता या इसके बारे में वह खुद निर्णय करेंगे। इसी क्रम में शकील अहमद ने सोनिया गांधी के उस वक्तव्य की याद दिलाई है कि 2009 में भी मनमोहन सिंह ही लालकिले पर झंडा फहराएंगे। दरअसल, कांग्रेस में यह मामला पिछले कुछ समय से बड़े सुनियोजित तरीके से उठाया जा रहा है। कुछ नेता इस पर चर्चा को आगे बढ़ाते हैं फिर उसे समेट लेते हैं, ताकि जनता के मिजाज को भांपा जा सके। कांग्रेस राहुल की स्वीकार्यता का परीक्षण कर रही है और उनके प्रधानमंत्री बनने के पक्ष में एक माहौल कायम करना चाहती है। अपने इस अजेंडे के तहत वह राहुल को सीधे प्रॉजेक्ट करने से बचना चाहती है। कांग्रेस ही नहीं, उसके सहयोगी दलों में भी इस बात पर सहमति बन गई है कि अगर चुनाव के बाद का समीकरण यूपीए के पक्ष में होता है, तो राहुल का नाम प्रस्तावित कर दिया जाए।दरअसल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की छवि को लेकर कांग्रेस बहुत आश्वस्त नहीं है। उसे लगता है कि मनमोहन सिंह की इमेज एक कमजोर नेता की रही है। पिछले पांच वर्षों के शासनकाल में कुल मिलाकर यही संदेश गया कि उनकी भूमिका महज प्रतीकात्मक है। न्यूक्लिअर डील को छोड़ दें, तो शायद ही कभी ऐसा लगा कि वह किसी मसले पर दृढ़ता के साथ सामने आए हों। पिछले कुछ समय से राजनीतिक गलियारे से छन-छनकर यह खबर आई (या आने दी गई) कि सरकार के कुछ हालिया फैसले राहुल गांधी के प्रभाव में लिए गए। मसलन मुंबई हादसे को लेकर पाकिस्तान के प्रति कड़े रुख का इजहार और जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला की ताजपोशी। लेकिन कांग्रेस सीधे-सीधे यह नहीं कह सकती कि वह मनमोहन सिंह के नेतृत्व को खारिज कर रही है। ऐसा करना यूपीए सरकार की उपलब्धियों पर खुद ही पानी फेर देना होगा, फिर वह कौन सा मुंह लेकर जनता के बीच वोट मांगने जाएगी?इसीलिए जो नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की बात कर रहे हैं, वे मनमोहन सिंह के कामकाज की प्रशंसा करना भी नहीं भूलते, लेकिन वे साफ तौर पर यह भी नहीं कहते कि कांग्रेस मनमोहन सिंह को भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश करके चुनाव मैदान में उतरेगी कि नहीं। चुनाव के पहले कांग्रेस नेतृत्व के सवाल को अनसुलझा रखना चाहती है लेकिन राहुल की इमेज चमकाने का अभियान भी चलता रहेगा।राहुल गांधी के मामले में सोनिया गांधी ने बहुत ही फूंक-फूंक कर कदम उठाए हैं। कुछ उसी तरह, जैसे राजीव गांधी के मामले में इंदिरा गांधी ने उठाए थे। पहले कहा गया कि राहुल राजनीति में नहीं आएंगे। फिर धीरे-धीरे वे सियासत में आए और उसके बाद सांसद बने। उसके बाद उन्हें पार्टी संगठन में अहम जिम्मेदारी दी गई। अपने चुनाव क्षेत्र और देश के दूसरे हिस्सों में राहुल लगातार दौरे कर रहे हैं। पार्टी चाहती है कि राहुल समाज से परिचित हों और जनता भी उन्हें जान जाए। शुरू-शुरू में राहुल ने कुछ अपरिपक्वता दिखाई थी। बांग्लादेश और बाबरी मस्जिद के संबंध में उनके दिए बयान से विवाद हुआ, पर अब वह बहुत संभलकर बोल रहे हैं। संसद में भी उनके भाषणों में परिपक्वता दिखने लगी है। सवाल है कि क्या देश की जनता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार करने को तैयार है? राहुल के व्यक्तित्व में कोई करिश्मा नहीं है, लेकिन युवा होना उनकी सबसे बड़ी ताकत है। यह ठीक है कि उन्हें अपने पिता की तरह किसी तरह की सहानुभूति लहर का लाभ नहीं मिल रहा है, लेकिन उनके लिए सकारात्मक बात यह है कि विपक्षी दलों के पास कोई युवा नेता नहीं है। यह नहीं भूलना चाहिए कि आज देश की 70 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की है। यह वर्ग अब राजनीति पर निर्णायक असर डालने की स्थिति में आ गया है। आज की यह युवा पीढ़ी स्वतंत्रता के बाद पैदा हुई है। यह कई पुराने आग्रहों और रूढि़यों से मुक्त है। यह सूचना क्रांति और ग्लोबलाइजेशन के दौर में जवान हुई है, इसलिए उसके सोचने का ढंग अलग है। यह पॉलिटिक्स और लीडरशिप के बारे में पुरानी पीढ़ी से भिन्न राय रखती है। इसे ऐसा नेता चाहिए जो ठोस काम करे, जो डिवेलपमंट सुनिश्चित कर सके ताकि इस पीढ़ी के सपने साकार हों। हाल के विधानसभा चुनावों के परिणाम में इस नजरिए की झलक मिली है। यह पीढ़ी अस्सी पार कर चुके लालकृष्ण आडवाणी की बजाय युवा राहुल गांधी को ज्यादा उम्मीद से देख रही है। राहुल के विरोध में यह तर्क दिया जाता है कि वह अनुभवहीन हैं। लेकिन आज के दौर में विजन ज्यादा महत्वपूर्ण है, अनुभव नहीं। नई पीढ़ी नया नजरिया चाहती है। रही वंशवाद की बात, तो यह मामला कमजोर पड़ता जा रहा है क्योंकि आज हर पार्टी इसका शिकार हो चुकी है। ऐसे में राहुल गांधी के लिए स्थितियां निश्चय ही अनुकूल होती जा रही हैं, लेकिन यह सवाल तो फिर भी बचता ही है कि क्या कांग्रेस राहुल गांधी को महज एक युवा प्रतीक की तरह इस्तेमाल करेगी या नई आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए सत्ता में रहकर या उसके बाहर गंभीरता से प्रयास भी करेगी?